Tips for eye care in hindi
सावधानी बरतकर बचें आखों के रोंगों से
आंखों की परेशानी आजकल लगभग सभी आयुवर्ग के लोगों में आम होती जा रही है। मोतियाबिंद, कालापानी व आंखों से जुड़ी अन्य समस्याएं छोटे बच्चों में भी देखने को मिल जाती हैं। वरिष्ठ नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ सुरेश कुमार पाण्डेय से जानते हैं इनके बारे में-
मोतियाबिंद की समस्या-
बढ़ती उम्र, सूर्य की पराबैंगनी किरणों के संपर्क में अधिक समय तक रहना व स्टेरॉइडयुक्त आईड्रॉप का लंबे समय तक प्रयोग करने से मोतियाबिंद होता है।
बचाव : धूप में निकलते समय यूवी प्रोटेक्शन चश्मा पहनें। बिना डॉक्टरी सलाह के किसी भी आईड्रॉप का प्रयोग न करें। इसके इलाज का विकल्प सर्जरी या लैंस प्रत्यारोपण है जो किसी भी मौसम में कराया जा सकता है। सर्जरी के लिए मोतियाबिंद के पकने का इंतजार न करें।
कालापानी की आशंका-
सही समय पर मोतियाबिंद का इलाज न होने से यह पककर फूट सकता है जिससे कालापानी की समस्या हो सकती है।
बचाव : 40 की आयु के बाद आंखों की जरूरी जांचें करवाएं। डॉक्टर के निर्देशानुसार दवाओं को समय पर लें।
रेटीना से जुड़ी परेशानी -
डायबिटीज़ व हाई बीपी के मरीजों में रेटीना संबंधी तकलीफ होने की आशंका अधिक होती है।
बचाव : ब्लड शुगर नियंत्रित रखें।
बच्चों में बीमारी -
कई बार चोट लगने या आनुवांशिक कारणों से बच्चों में नेत्र संबंधी परेशानियां हो सकती हैं। इसके अलावा गर्भावस्था के दौरान यदि महिला में रूबेला सिंड्रोम की वजह से इंफेक्शन हो जाए तो इसका वायरस गर्भस्थ शिशु की आंख में जा सकता है। इससे जन्म के बाद उसे मोतियाबिंद, कम सुनाई देना या हृदय संबंधी रोग हो सकते हैं। कई बार प्री-मेच्योर डिलीवरी के बाद बच्चों को दिए गए ऑक्सीज़न की वजह से भी आंख में हो रही सामान्य दिक्कते भविष्य में आंख संबंधी अन्य रोगों का कारण बन सकती है। जन्म के 4-6 हफ्ते बाद बच्चे की नेत्र संबंधी जांच कराना ठीक रहता है।
ध्यान रखें : लगातार कम्प्युटर पर काम करने के दौरान थोड़ी-थोड़ी देर में आंखों को आराम दें। ऐसा न करने से कॉर्निया (पारदर्शी पुतली) प्रभावित हो सकता है। आंख में चोट लागने या धूल-मिट्टी गिरने पर आंखों को न रगड़े क्योंकि इससे घाव बन सकता है, ऐसे में आंख को ठंडे पानी से धोएं।
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