Thursday, 3 December 2015

Genetic and Metabolic diseases in newborns babies

Genetic and Metabolic diseases in newborns babies
अब न्युबॉर्न में जेनेटिक और मेटाबॉलिक बीमरियों को पहचानना आसान

आजकल बच्चों में दुर्लभ और वंशानुगत बीमारियां बढ़ रही हैं। बच्चों में करीब सात हजार दुर्लभ बीमारियां होती हैं। इनमें से 80 परसेंट जेनेटिक होती हैं। पचास परसेंट बीमारियों के लक्षण न्यू बॉर्न को देखने से मालूम चल पाते हैं। समय पर बीमारी मालूम चलने पर इलाज संभव हो सकता है, लेकिन ट्रीटमेंट में देरी होनी से बच्चे का सही इलाज़ नहीं हो पाता। 

जेनेटिक और मेटेबॉलिक डिसऑर्डर पहचानने के लिए अब ब्लड की एक बूंद से बच्चे की बीमारी को डायग्नोस किया जा सकता है। यह न्यूबॉर्न बेबी के स्क्रीनिंग टेस्ट से संभव हो पा रहा है। 

न्यूबॉर्न की एड़ी से ब्लड की एक ड्रॉप लेकर ये टेस्ट किया जाता है, ब्लड की एक बूंद से उसकी बीमारीयों की स्क्रीनिंग की जाती है। पहले 4 से 6 साल की उम्र में इन बीमारियों की पहचान हो पाती थी। ट्रीटमेंट में देरी से ऐसे केसेज अक्सर बिगड़ जाते थे। अब इनकी पहचान और इलाज सही समय पर हो पाता है जिससे बच्चों की quality ऑफ लाइफ बेहतर हो जाती है। 

डॉ. अशोक गुप्ता, पीडियाट्रिशियन, अधीक्षक, जेकेलोन हॉस्पिटल

ब्रेन स्ट्रोक - Brain Stroke in Hindi

ब्रेन स्ट्रोक Understand Brain Stroke in Hindi

ब्रेन स्ट्रोक के बाद एक ही पल में ठीक-ठाक व्यक्ति समान्य कार्य करने में विफल हो जाता है। ब्लड सप्लाई में रुकावट के कारण स्ट्रोक आता है। ब्लड वैसल के फ़्लो में ब्लड क्लॉट के कारण और कई बार ब्लड वैसल प्रभावित होने से भी स्ट्रोक आ सकता है। चूंकि खून ही दिमाग को जरूरी न्यूट्रीयंट्स सप्लाई करता है, जिससे दिमाग महत्वपूर्ण फंक्शन आसानी से कर सके।

खून की सप्लाई में कुछ सैकंड के लिए रुकावट आने से न्यूरॉन्स खत्म होने लगते हैं। इसलिए स्ट्रोक में हर लम्हा अहम होता है। 

स्ट्रोक के लक्षण में यह शामिल हैं- सुस्ती आना, कमजोरी महसूस होना और शरीर के हिस्से में पैरालसिस आना। इनके अलावा कंफ्यूजन, बिना कारण सिर में तेज दर्द होना, बोलने में परेशानी आना, चलने में दिक्कत, बैलेंस खोना इस बीमारी के बाकी लक्षण है। स्ट्रोक को फास्ट (एफ–फेस, ए-आर्म, एस-स्पीच, टी-टाइम) से जाना जाता है। सीटी स्कैन और एमआरआई से स्ट्रोक के कारण और किस्म का पता चलता है। स्ट्रोक के कारण और किस्म का पता चलता है। स्ट्रोक के 4-5 घंटे में मरीज को क्लॉट खत्म करने वाली दवा और सही इलाज दिया जाए तो मरीज के जीवित रहने की संभावना बढ़ जाती है।

कई बार लोग स्ट्रोक के लक्षण को समझने और समय पर अस्पताल पहुंचने में विफल होते हैं। जो रिस्क फैक्टर हृदय रोग के है, वहीं स्ट्रोक के हैं। हाई ब्लड प्रैशर, हाई कोलेस्ट्रॉल, डायबिटीज़, सर्कुलेशन प्रॉबल्म, फिजिकल एक्टिविटी न होना और मोटापा कुछ कारण हैं। 

सही खान-पान, व्यायाम करना, हैल्थ इश्यू को चैक में रखने से स्ट्रोक टल सकता है।

डॉ. जेडी मुखर्जी न्यूरोलाजिस्ट, मैक्स हॉस्पिटल, नई दिल्ली।

Weight Loss tips in winter season

Winter Season diet plan to lose weight
सर्दी में आसानी से कम करना चाहते हैं वजन, तो ये खाएं

माना जाता है कि गर्मी के अपेक्षा सर्दी में वजन कम करना थोड़ा मुश्किल हो जाता है। जबकि सर्दी की कुछ खास चीजें खाने से कैलोरी बर्न करना आसान बन जाता है। आमतौर पर सर्दी के दिनों में भूख अधिक लगती है, लेकिन इन्हे खाने से बार-बार भूख भी नहीं लगती और शरीर को जरूरी पौष्टिक तत्व भी मिलते हैं। जानिए इनके बारे में...

आलू: इसमें होता है विटामिन–सी और बी6 स्टार्च से भरपूर इस सब्जी में कई न्यूट्रियंट्स भी पाए जाते हैं। इसमें विटामिन-सी और विटामिन-बी6 भारी मात्रा में पाए जाते हैं। मीडियम साइज का आलू खाने से शरीर की 25 से 29 फीसदी जरूरत पूरी हो जाती है। इसमें फोलेट भी पाया जाता है। आलू का छिलका फाइबर का अच्छा सोर्स है। इसे खाने से ब्लड शुगर संतुलित रहता है।

अनार: एंटीऑक्सीडेंट्स से भरपूर होता है अनार का जूस एंटीऑक्सीडेंट्स का अच्छा सोर्स है। रोज एक कप इसका जूस पीने से शरीर में बैड कोलेस्ट्रॉल का उत्पादन कम किया जा सकता है। इतना ही नहीं, अनार का जूस शरीर में खून के प्रवाह को बेहतर बनाता है। इसी वझ से हृदय और रक्त संबंधित बीमारियों की आशंका कम होने लगती है।

ओट्मील: इसे खाने से लंबे समय तक रहती है ताकत नाश्ते में ओट्मील खाइए। इसमें न्यूट्रियंट्स और फ़ायटोकैमिकल्स भारी मात्रा में पाए जाते है। इसे खाने के बाद शरीर में लंबे समय तक ताकत बनी रहती है। शोध के अनुसार जो नाश्ते में ओट्मील खाते हैं, वे दोपहर के खाने में एक-तिहाई कैलोरी कम खाते है। इसमें जिंक और सॉल्यूबल फाइबर पर्याप्त मात्रा में होते हैं। कोलेस्ट्रॉल लेवल कम करने में करगार होता है।

अमरूद: एक सर्विंग में मात्र 60 कैलोरीज़ इस फल का स्वाद स्ट्रोबेरी से मिलता-जुलता है। ऑरेंज की तुलना में इस फल में पांच गुना ज्यादा विटामिन-सी होता है। इसके बीज खाने से शरीर को फाइबर कंटेंट मिलता है। इसमें कई दूसरे न्यूट्रियंट जैसे पोटेशियम, आयरन, कैल्शियम आदि होते हैं। सबसे अच्छी बात यह है कि इसकी एक सर्विंग में सिर्फ 60 कैलोरीज़ होती है। यही इसे बेस्ट स्लिमिंग फूड बनाता है।

स्ट्रॉबेरी: पेट रखता है सुरक्षित एक कप स्ट्रॉबेरी में मात्र 50 कैलोरीज़ और 2 ग्राम तक फाइबर होता है। जिन लोगों के शरीर में विटामिन-सी की कमी है तो रोज एक कप स्ट्रॉबेरी खाएं। इससे शरीर की 160 फीसदी जरूरत पूरी होगी। शराब के सेवन से पेट को होने वाले नुकसान को कम करने के लिए एंटीऑक्सीडेंट्स और फिनोलिक कम्पाउंड पाए जाते हैं। अच्छी बात यह है कि स्ट्रॉबेरी पूरे वर्ष उपलब्ध होती है।

ब्रोकली / पत्ता गोभी: विटामिन-सी का अच्छा स्त्रोत इन दोनों प्रकार की सब्जियों में विटामिन-सी भारी मात्रा में होता है। इसे खाने से इम्यून सिस्टम की फंक्शनिंग बेहतर बनती है। बाजार में फ्रेश सब्जी नहीं मिल रही तो कोई बात नहीं। सुपरमार्केट में फ़्रोजन फूड भी उतने ही फायदेमंद होते हैं।



What Is Sleep Apnea in Hindi | Cause symptoms treatment

What Is Sleep Apnea and its cause symptoms treatment  

स्लीप एप्निया आम समस्या है, जिसमें कई बार सोते वक्त व्यक्ति की सांस की नली आंशिक या पूरी तरह अवरुद्ध हो जाती है। करीब 5 फीसदी पुरुष और 3 फीसदी महिलाएं स्लीप एप्निया से पीड़ित होते हैं। इससे दिन भर नींद आने से रकचाप बढने जैसी समस्याओं के साथ दिल के रोग व डायबिटीज़ का खतरा बढ़ जाता है।

स्लीप एप्निया और खर्राटे, दोनों एक जैसी समस्याएं लगती हैं, लेकिन उनमें फर्क है, जब सोते वक्त जीभ की मांसपेशियां एवं ऊपरी श्वसन नली विश्राम करने लगती हैं तो इस वजह से उस नली में आंशिक या पूर्ण रूप से व्यवधान पैदा होने लगता है। खर्राटे की स्थिति में श्वास नली थोड़ी संकीर्ण हो जाती है, जिस वजह से उसमें काफी कंपन पैदा होता है, जिससे खर्राटे की आवाज निकलने लगती है। 

स्लीप एप्निया में भी श्वासनली संकीर्ण या पूरी तरह अवरुद्ध हो जाती है, जिससे सांस लेने में दिक्कत होती है, इस वजह से थोड़ी ही देर में नींद खुल जाती है, जिसे एराउजल या जागरण कहा जाता है, क्योंकि व्यक्ति का मस्तिष्क इस स्थिति को भांपकर नींद तोड़ देता है ताकि कंठनली की मांसपेशियां पुनः नियंत्रित हो जाए और श्वास नली को खोल सके। नींद में पॉज़, एप्निया कहलाता है, जो कुछ सेकंड से लेकर कई मिनटों का हो सकता है। यह एक घंटे में पांच बार तक हो सकता है।

स्लीप एप्निया के सामान्य लक्षण: ज़ोर-ज़ोर से खर्राटे लेना, थकान, दिन के वक्त अनिंद्रा, सांस लेने के लिए चौंककर या घबराकर जागना। स्लीप एप्निया से पीड़ित व्यक्ति को शायद ही यह अहसास होता है कि उसे सोते वक्त सांस लेने में दिक्कत आती है। इसका पता तो दूसरों को लगता है, जब वे इसे होते हुए देखते हैं, अनिंद्रा, एकाग्रता और याददाश्त की दिक्कतें, नंपुसकता या कमजोरी, मूड में बदलाव या चिड़चिड़ापन, रात के वक्त बार-बार पेशाब आने की समस्या, सुबह जागने पर सिरदर्द आदि इसके लक्षण हैं।

खतरा इन्हे अधिक: अधिक वजन या मोटापे से पीड़ित व्यक्तियों के अलावा डायबिटीज़, हाइपरटेंशन, हार्ट फ़ेल्योर, एट्रियल फ़िब्रिलेशन (दिल में सुराख) जैसी समस्यों से पीड़ित मरीजों को स्लीप एप्निया की भी जांच करानी चाहिए। यदि किसी के परिवार में ओएसए या खर्राटे की समस्या है, उन्हे इसका खतरा होता है। जिन व्यक्तियों का निचला जबड़ा छोटा और ऊपरी श्वासनली संकीर्ण हो, गले का घेरा अधिक हो, जिनका ट्रॉन्सिल बढ़ा हुआ हो या नाक बंद हो, उन्हे भी स्लीप एप्निया हो सकता है। जो सोते वक्त नींद की गोलियां, दर्द निवारक दवाएं, नशीली दवा तथा अल्कोहल का सेवन करते हैं, उन्हे भी स्लीप एप्निया का खतरा रहता है, क्योंकि ये दवाएं व पदार्थ गले को शिथिल कर उसका घेरा बढ़ा देते हैं।

मैनोपॉज के बाद महिलाओं में: स्लीप एप्निया से महिलाओं में हाइपोथायराइड की समस्या (थायरॉइड हार्मोन कम होना), एक्रोमेगली (ग्रोथ हार्मोन का उच्च स्तर), डिस्ट्रोफ़िज़ आदि जैसे स्नायु रोग आदि की आशंका हो सकती है।

स्लीप एप्निया का इलाज नहीं कराने पर हाइपरटेंशन, स्ट्रोक और हार्ट फ़ेल्योर, का खतरा दोगुना हो जाता है। टाइप 2 डायबिटीज़ मेलिटस का खतरा बढ़ सकता है और स्लीप एप्निया का इलाज नहीं करवाने वाले व्यक्तियों में पांच गुना अधिक अवसाद और याददाश्त खोने की समस्या आम होती है।

इलाज के विकल्प: यदि आप मॉडरेट या गंभीर स्लीप एप्निया से पीड़ित हैं या आपकी स्वयं-सहायता रणनीतियां अपनाने और लाइफस्टाइल में बदलाव की कोशिशों को कामयाबी नहीं मिल पाई है तो किसी डॉक्टर से संपर्क करें। आमतौर पर इलाज की शुरुआत व्यवहार संबंधी थैरेपी से शुरू होती है। अल्कोहल और नींद की गोलियां जैसी चीजों से बचने को कहा जाता है, चूंकि पीठ के बल सोने से यह तकलीफ हो सकती है, इसलिए करवट बदलकर सोने को कहा जाता है।

ब्रिदिंग डिवाइसेज स्लीप एप्निया के इलाज का अच्छा साधन है। आंशिक से लेकर गंभीर स्लीप एप्निया के लिए पॉज़िटिव एयरफ़्लो प्रेशर (सीपीएपी) सबसे सामान्य इलाज है। इसमें प्रेशराइज्ड एयर के जरिये सोते समय रोगी के एयरवे खुले रखे जाते हैं। रोगी प्लास्टिक का फेशियल मास्क पहने होता है, जो नालियों के जरिये पास में रखी सीपीएपी मशीन से जुड़ा होता है। कुछ लोगों को नाक व त्वचा में जलन की समस्या होती है। इलाज का अंतिम विकल्प सर्जरी है, यह हर रोगी के लिए अलग प्रकार की हो सकती है।

Facts - सीपीएपी को आम बोलचाल में सीपैप कहते है। इस डिवाइस को ऑस्ट्रेलिया के प्रोफेसर कॉलिन सुलिवन ने 1981 में बनवाया था।

डॉ. हिमांशु गर्ग
डायरेक्टर, स्लीप केयर सॉल्यूशंस, गुड़गांव

हेमोक्रोमैटोसिस Hemochromatosis cause symptoms and treatment

What is Hemochromatosis in Hindi
Hemochromatosis cause symptoms and treatment

शरीर मे आयरन जमा होना यानी हेमोक्रोमैटोसिस हो तो इससे अंग प्रभावित होने लगते हैं। शरीर मे आयरन का स्तर 3-4 ग्राम होता है। आयरन की संपूर्ण मात्रा बड़ी सावधानी से नियंत्रित होती है। हर दिन एक मिग्रा. आयरन पसीने, तवचा की मृत कोशिकाओं और आंतों की अंदरूनी परत गिरने से निकलता है।

महिलाओं के शरीर से मासिक धर्म के दौरान प्रतिदिन औसतन एक मिलीग्राम आयरन बाहर निकल जाता है। सामान्य वयस्क व्यक्ति में इस आयरन की क्षति की भरपाई करने के लिए प्रतिदिन एक मिलीग्राम आयरन अवशोषित होता है। यही कारण है कि शरीर में आयरन की अतिरिक्त मात्रा जमा नहीं हो पाती। जब शरीर अधिक मात्रा में आयरन खोता है, तब स्वभाविक रूप से आयरन का अवशोषण भी बढ़ जाता है। लेकिन जो लोग हेमोक्रोमैटोसिस से पीड़ित होते हैं, उनमें प्रतिदिन आंतों से उससे अधिक मात्रा में आयरन अवशोषित होता है, जितनी आवश्यकता शरीर को खोए हुए आयरन से बदलने के लिए होती है।

क्या होता है हेमोक्रोमैटोसिस?

हेमोक्रोमैटोसिस आयरन मेटाबॉलिज़्म की एक आनुवांशिक गड़बड़ी है। हेमोक्रोमैटोसिस में, रोगी के शरीर से आयरन बाहर निकालने की बजाय जमा होने लगता है। जिन अंगों के टिश्यू में आयरन का जमाव होने लगता है, उनकी कार्यप्रणाली आसामान्य हो जाती है और इसके कारण गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं हो जाती हैं।

कारण: हेमोक्रोमैटोसिस आनुवांशिकी से संबंधित है, जो बच्चों को उनके माता-पिता से विरासत में मिलता है। यह उन जींस में म्युटेशन के द्वारा होता, जो शरीर में आयरन की मात्रा को नियंत्रित करते हैं।

लक्षण और स्वास्थ्य जटिलताएं: आयरन की यह अधिक मात्रा जोड़ों, लीवर टेस्टिकल और हृदय में जमा हो जाती है। फिर इन अंगों को क्षति पहुंचाती है। जो महिलाएं इस रोग से पीड़ित होती हैं, उनके शरीर में आयरन का संग्रह पुरुषों की तुलना में धीमी गति से होता है, क्योंकि मासिक धर्म और स्तनपान के दौरान उनके शरीर से काफी मात्रा में आयरन बाहर निकल जाता है। इसलिए उनमें हेमोक्रोमैटोसिस के कारण होने वाले अंगों की क्षति के लक्षण पुरुषों की तुलना में दस वर्ष बाद दिखाई देते हैं।

पुरुषों में इससे तवचा का रंग गहरा होता है।
टेस्टिकल में आयरन के जमने से वे सिकुड़ जाते जो न्ंपुसकता का कारण बन सकते हैं।
अग्नाशय में इसके जमा होने से इंसुलिन बनना कम हो जाता है, जिससे डायबिटीज़ हो सकती है।
हृदय की मांसपेशियों में आयरन के जमा होने से कार्डियोमायोपैथी हो सकती है, किसके कारण हार्ट फेलियर होने की आशंका बढ़ जाती है। इसकी अधिक मात्रा हृदय की धड़कनों को अनियमित करती है, जिसे अरदिमिया कहते हैं।
लिवर में जमा होने से लिवर सिरोसिस और लिवर कैंसर होने का खतरा बढ़ जाता है।
फेफड़ों में जमने से सांस की समस्या होती है।
जोड़ों में जमाव जोड़ों के दर्द का कारण बनता है।
जब एंडोक्राइन ग्रंथियों में जमाव हो तो हार्मोन्स का संतुलन गड़बड़ा जाता है।

रोकथाम और उपचार: इसको रोकने का सबसे कारगर उपाय स्क्रीनिंग है। एक बार जब किसी व्यक्ति में हेमोक्रोमैटोसिस की पहचान हो जाए, तब उसके सभी भाई-बहनों और रिशतेदारों को स्क्रीनिंग करानी चाहिए। यदि उन्हे यह रोग है, तब उन्हे तुरंत इलाज करना चाहिए। 

हेमोक्रोमैटोसिस का सबसे प्रभावी उपचार फ्लेमबोटॉमी यानी भुजाओं की शिराओं से रक्त निकालना। इसके द्वारा शरीर में आयरन के स्तर को कम किया जा सकता है। इसमें एक या दो हफ्ते में रक्त की एक यूनिट निकाली जाती है, जिसमें लगभग 250 मिलीग्राम आयरन होता है। धीरे-धीरे इस प्रक्रिया को दो-तीन महीनें में एक बार किया जाता है। इससे उन अंगों की कार्यप्रणाली सुधर जाती है जो आयरन के जमाव के कारण प्रभावित हो गई थी। 

नियमित रूप से रक्तदान करना भी हेमोक्रोमैटोसिस का एक उपचार हो सकता है। एक अध्ययन में यह बात सामने आई है कि जिनके शरीर में आयरन अधिक मात्रा में संग्रहीत है अगर वो नियमित रूप से रक्तदान करेंगें तो उनकी इंसुलिन के प्रति संवेदनशीलता और डायविटीज़ की समस्या समाप्त हो जाएगी। जो एनीमिया या हृदय से संबंधित जटिलताओं के कारण रक्त नहीं निकलवा सकते उनके लिए कीलैशन उपचार है। इसमें शरीर से आयरन निकालने के लिए कुछ दवाइयां दि जाती है।

डॉ. गौरव खरया
कंसल्टेंट पीडियाट्रिक्स,
इमेटोऑन्कोलॉजी,
इम्युनोलॉजी, एवं बोन मैरो
ट्रांसप्लांट, नई दिल्ली


मल्टीपल स्क्लेरोसिस Multiple Sclerosis Cause Symptoms Treatment in Hindi

Multiple Sclerosis Cause Symptoms Treatment in Hindi
मल्टीपल स्क्लेरोसिस

मल्टीपल स्क्लेरोसिस यानी MS क्रॉनिक बीमारी है, जो आपके मस्तिष्क, रीढ़ और आंखों की ऑप्टिक तंत्रिकाओं को प्रभावित करती है। यह दृष्टि, संतुलन, मांसपेशियों पर नियंत्रण तथा शरीर की अन्य सामान्य गतिविधियों में समस्या पैदा कर सकती है। इससे दैनिक कार्य नहीं कर सकते हैं, पर यह लकवे से अलग है।

आमतौर पर एमएस को ऑटोइम्यून रोग समझा जाता है, जिसमें शरीर की रोगप्रतिरोधक प्रणाली ऐसी कोशिकाएं और प्रोटीन (एंटीबॉडीज) बनाने लगती है, जो मायलिन को नुकसान पहुंचाने लगती है, जो मायलिन एक वसायुक्त तत्व है, जो तंत्रिकाओं के फाइबर की रक्षा करता है।

MS की वजह: MS का कारण तो ज्ञात नहीं है, लेकिन केंद्रीय तंत्रिका का यह रोग पुरुषों की तुलना में महिलाओं को 2.5 गुना ज्यादा प्रभावित करता है। यह आनुवांशिक रोग भी नहीं है, लेकिन कुछ लोगों में यह रोग पनपने की आशंका बढ़ाने वाले कुछ आनुवांशिक कारकों की अहम भूमिका भी होती है। धूम्रपान से इसका अधिक खतरा रहता है।

लक्षण: ज़्यादातर मरीजों को पहली बार लक्षण 20-40 वर्ष की उम्र में महसूस होते है। यह तंत्रिकाओं के क्षतिग्रस्त होने वाले स्थान पर निर्भर करता है की किस व्यक्ति पर इस रोग का कितना असर होगा। यह रोग आंशिक, सामान्यता गंभीर हो सकता है। क्षतिग्रस्त होने का मतलब है कि आपका मस्तिष्क आपके शरीर के अन्य हिस्सों को सही तरीके से संदेश नहीं पहुंचा सकता है। इसके परिणामस्वरूप आपकी तंत्रिकाएं भी काम करना बंद कर देती हैं, जबकि इन्हे आपके चलने-फिरने और अहसास करने में मदद करनी चाहिए।

कुछ लक्षण जो जल्दी उभरते हैं- दृस्टी समस्या, ऑप्टिक न्यूराइटिस, आंखों की तंत्रिकाओं में जलन आदि शुरुआती आम लक्षण हैं। मरीज को शुरु-शुरू में धुंधली या दो-दो चीजें नजर आने की शिकायत हो सकती है और आमतौर पर एक एक आंख की समस्या के कारण होता है। जैसे-जैसे स्थिति बिगड़ती है, मरीज की दृष्टि कमजोर हो जाती है। दृष्टिहीनता के मामले बहुत कम ही होते हैं।

सिहरन और संवेदनशून्यता या जलन का अहसास या संवेदना की कमी हो सकती है। अत्यंत गर्मी या ठंडक की अनुभूति। ये लक्षण अक्सर पैरों या बांह के आखिरी छोर से शुरू होते हैं और ऊपर बढ़ते हुए पैर के आरंभ बिंदु तक पहुंच जाते है। मांसपेशियों की कमजोरी और मरोड़, पैरों में कमजोरी, बेचैनी या भारीपन महसूस कर सकता है। उन्हे तेजी से उंगलियां चलाने में भी दिक्कत आ सकती है।

संतुलन और तालमेल बनाने की समस्याएं- मरीज की चाल अनियंत्रित हो जाती है और चलने तथा संतुलन बनाए रखने में दिक्कत आती है। ये समस्याएं चक्कर आने और कंपकंपी जैसे एमएस के अन्य सामान्य लक्षणों के कारण बढ़ सकती है।

थकान: थकान एमएस का सबसे सामान्य और लाचार कर देने वाला लक्षण है। और अक्सर यह रोग की शुरुआत से ही बढ़ने लगती है। यह तकरीबन सभी मरीजों में पाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण लक्षण है। याद रखें कि सभी मरीजों में सभी लक्षण नहीं होते हैं। साथ ही ज़्यादातर एमएस पीड़ितों को तभी दौरा पड़ता है, जब स्थिति बहुत ज्यादा बिगड़ जाती है। इसे रीलैप्स कहते है। समय के साथ यह बीमारी बदतर होती चली जाती है।

जांच: एमएस की जांच एक बड़ी चुनौती होती है, क्योंकि इसके लक्षण भी कई अन्य नर्व डिसऑर्डर की तरह ही होते हैं। दरअसल, किसी एक जांच से साबित नहीं हो सकता कि आप एमएस पीड़ित है। लिहाजा कई प्रकार की जांच करानी पड़ती है, जिनमें शामिल हैं-

रक्त जांच से पता चलता है कि व्यक्ति इससे पीड़ित है या नहीं, क्योंकि इसके कुछ लक्षण एड्स की तरह ही होते हैं। अपने संतुलन, समन्वय, दृष्टि और अन्य गतिविधियों की जांच कराकर देखें कि आपकी तंत्रिकाएं कितनी सक्रियता से काम कर रही है। एमआरआई से शरीर की संपूर्ण तस्वीर साफ हो जाती है। मस्तिष्क और स्पाइनल कॉर्ड में मौजूद द्रव्य सेरेब्रोस्पाइनल फ़्लड (सीएसएफ) कहलाता है। इसकी जांच से रोग का पता लगता है, क्योंकि एमएस पीड़ित लोगों के सीएसएफ में अमूमन खास प्रकार का प्रोटीन पाया जाता है।

इलाज: एमएस का अभी तक कोई खास इलाज नहीं निकला है। लेकिन कई प्रकार के उपचार से आपको अच्छा महसूस हो सकता है। डॉक्टर ऐसी दवाइयां देते है, जिनसे इस बीमारी की रफ्तार प्रक्रिया धीमी हो सकती है।

फ़ैक्ट- यदि किसी के माता-पिता इससे पीड़ित हैं, तो उस व्यक्ति में होने की आशंका तीन फीसदी रहती है।

डॉ. जयदीप बंसल
सीनियर कंसलटेंट,
न्यूरोलोजी, सरोज सुपर
स्पेशलिटी हॉस्पिटल, दिल्ली

स्ट्रोक - Stroke Warning Symptoms and Care

What is Stroke and its symptoms
How to cure stroke

वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन के ताजा डेटा के अनुसार हर वर्ष करीब 17 मिलियन लोगों की कार्डियो वेस्कुलर डिसिज के कारण मृत्यु होती है। इसमें भी हार्ट अटैक और स्ट्रोक सबसे आम है। जो लोग पहले से स्ट्रोक के शिकार है, उन्हे ध्यान रखना चाहिए कि दोबारा स्ट्रोक न हो। स्ट्रोक के खतरे को कम करने के लिए डॉक्टर कि मदद से ज्यादा बहुत चीजों की जरूरत है। 

हेल्दी लाइफस्टाइल अपनाकर स्ट्रोक से राहत मिल सकती है। 60 वर्ष की उम्र के बाद स्ट्रोक के केस आम हैं। 15 से 59 वर्ष के लोगों के बीच स्ट्रोक पांचवां सबसे बड़ा कारण है। 

जब दिमाग तक पहुंचने वाले खून में कोई अड़चन आती है या ब्लड वैसल लीक या बस्ट करते हैं, तभी स्ट्रोक आता है। हाई स्ट्रैस जॉब से भी स्ट्रोक की संभावना तेजी के साथ बढ़ने लगती है। इसके अलावा धूम्रपान, शराब का ज्यादा सेवन, फिजिकल एक्टिविटीज़ कम होनी या खान-पान की आदतें अच्छे न होने के कारण भी स्ट्रोक की आशंका बढ़ जाती है। इन कुछ आदतों को अपनी दिनचर्या में शामिल करने से स्ट्रोक के खतरे को टाला जा सकता है। जानिए इसके बारे में-

  • ब्लड प्रैशर और शुगर लेवल पर विशेष ध्यान दीजिए। हाई ब्लड प्रैशर होने के कारण आर्टरीज़ पर दबाव पड़ता है जिससे वे बस्ट हो जाती है नतीजा होता है स्ट्रोक। डायबिटीज़ भी आर्टरीज़ के लिए हानिकारक है। 
  • वजन और बीएमआई को भी कंट्रोल में रखिए। आपका वजन, आइडल वेट से 10 फीसदी ही ज्यादा होना चाहिए। इससे ज्यादा घातक है।
  • धूम्रपन की आदत छोडकर, दूसरे स्ट्रोक के खतरे को टाला जा सकता है। कोई आदत स्ट्रोक के लिए सबसे खराब है तो वे धूम्रपान है। शराब का सेवन कम करिए। क्योंकि शराब पीने से ब्लड प्रैशर बढ़ने लगता है जो स्ट्रोक के लिए घातक साबित होता है। 
  • रिलैक्स रहिए। तनाव को कम करने की कोशिश करिए, क्योंकि तनाव के कारण भी ब्लड प्रेशर बढ़ता है। 
  • पर्याप्त नींद लें और शरीर को रिचार्ज करने के लिए समय-समय पर ब्रेक लें। 
  • एंटिऑक्सीडेंट व फाइबर से भरपूर डाइट खाइए। रोज व्यायाम करिए। वॉक, गार्डनिंग आदि करिए। डॉक्टर से बात करने के बाद वॉटर एरोबिक्स करें।

डॉ. पीएनरंजन
सीनियर कंसल्टेंट, न्यूरोलॉजी,
अपोलो हॉस्पिटल, नई दिल्ली

How to reduce calories to lose weight - low calorie food

How to reduce calories to lose weight - low calorie food
एक दिन में 100 कैलोरी कम करने के लिए खाइए -

अकसर लोंगों के टेंशन रहती है कि क्या खाएं, जिससे वजन काबू में रहे। कम से कम कैलोरी के लिए, खाने में इन चीजों को शामिल करीए। 

खाने में छुपा हुआ शुगर कंटेंट कितना है उसे पहचानिए: एक चम्मच शुगर यानी 20 किलो कैलोरी। शोध के अनुसार एक सामान्य भारतीय रोज़ाना 70 ग्राम यानी 14 चम्मच शुगर खाता है। शुगर की जगह पर कॉफी में दालचीनी और शहद का प्रयोग बिल्कुल मत करिए। 

ब्रेकफस्ट में ओटमील का सेवन: रेडी-टू-ईट सीरियल्स जैसे शुगर कॉर्नफ्लेक्स की जगह पर ओटमील खाने से फूड कम होने लगती है और लंच में कैलोरी का सेवन 31 फीसदी तक कम करते हैं। उदाहरण के लिए अगर आप लंच में 450 किलो कैलोरी खाते हैं तो ओटमील ब्रेकफस्ट करने के बाद 139 किलो कैलोरी का सेवन कम करेंगे। 

छोटी प्लेट का इस्तेमाल: प्लेट का साइज 12 इंच से 10 इंच करिए। ऐसा करने से कैलोरीज़ का सेवन 22 फीसदी तक कम किया जा सकता है। यानी 100 कैलोरी तक सेव कर सकते हैं। एक समय पर सामान्य व्यक्ति 500 किलो कैलोरी खाता है। 

शाम के वक्त हेल्दी स्नैक: शाम को 4 से 5 बजे के बीच छोटा बाउल होलव्हीट फ्लेक्स में चाट मसाला डाल कर खाएं। इसमें सिर्फ 362 किलो कैलोरी होते हैं, जबकि एक समोसे में 462 कैलोरीज़ पाई जाती हैं। 

खाने की शुरुआत फलों या सब्जियों वाले सलाद से करिए: फल या हरी सब्जियों से बने सलाद के साथ खाना शुरू करने से 12 फीसदी तक कम कैलोरी का सेवन करते हैं। सलाद और फलों में मौजूद फाइबर कंटेंट और पानी से पेट भर जाता है। हाई-कैलोरी वाले खाने का सेवन भी कम से कम करेंगे।