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Tuesday, 3 November 2015

Tips for eye care in hindi

Tips for eye care in hindi
सावधानी बरतकर बचें आखों के रोंगों से

आंखों की परेशानी आजकल लगभग सभी आयुवर्ग के लोगों में आम होती जा रही है। मोतियाबिंद, कालापानी व आंखों से जुड़ी अन्य समस्याएं छोटे बच्चों में भी देखने को मिल जाती हैं। वरिष्ठ नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ सुरेश कुमार पाण्डेय से जानते हैं इनके बारे में-

मोतियाबिंद की समस्या-

बढ़ती उम्र, सूर्य की पराबैंगनी किरणों के संपर्क में अधिक समय तक रहना व स्टेरॉइडयुक्त आईड्रॉप का लंबे समय तक प्रयोग करने से मोतियाबिंद होता है। 

बचाव : धूप में निकलते समय यूवी प्रोटेक्शन चश्मा पहनें। बिना डॉक्टरी सलाह के किसी भी आईड्रॉप का प्रयोग न करें। इसके इलाज का विकल्प सर्जरी या लैंस प्रत्यारोपण है जो किसी भी मौसम में कराया जा सकता है। सर्जरी के लिए मोतियाबिंद के पकने का इंतजार न करें।

कालापानी की आशंका-

सही समय पर मोतियाबिंद का इलाज न होने से यह पककर फूट सकता है जिससे कालापानी की समस्या हो सकती है। 

बचाव : 40 की आयु के बाद आंखों की जरूरी जांचें करवाएं। डॉक्टर के निर्देशानुसार दवाओं को समय पर लें।

रेटीना से जुड़ी परेशानी -

डायबिटीज़ व हाई बीपी के मरीजों में रेटीना संबंधी तकलीफ होने की आशंका अधिक होती है। 

बचाव : ब्लड शुगर नियंत्रित रखें। 

बच्चों में बीमारी -

कई बार चोट लगने या आनुवांशिक कारणों से बच्चों में नेत्र संबंधी परेशानियां हो सकती हैं। इसके अलावा गर्भावस्था के दौरान यदि महिला में रूबेला सिंड्रोम की वजह से इंफेक्शन हो जाए तो इसका वायरस गर्भस्थ शिशु की आंख में जा सकता है। इससे जन्म के बाद उसे मोतियाबिंद, कम सुनाई देना या हृदय संबंधी रोग हो सकते हैं। कई बार प्री-मेच्योर डिलीवरी के बाद बच्चों को दिए गए ऑक्सीज़न की वजह से भी आंख में हो रही सामान्य दिक्कते भविष्य में आंख संबंधी अन्य रोगों का कारण बन सकती है। जन्म के 4-6 हफ्ते बाद बच्चे की नेत्र संबंधी जांच कराना ठीक रहता है।

ध्यान रखें : लगातार कम्प्युटर पर काम करने के दौरान थोड़ी-थोड़ी देर में आंखों को आराम दें। ऐसा न करने से कॉर्निया (पारदर्शी पुतली) प्रभावित हो सकता है। आंख में चोट लागने या धूल-मिट्टी गिरने पर आंखों को न रगड़े क्योंकि इससे घाव बन सकता है, ऐसे में आंख को ठंडे पानी से धोएं।


Sunday, 18 October 2015

Rain and Eye Conjunctivitis in Hindi

Rain and Eye Conjunctivitis - In Hindi
बारिश में रखें आंखों का खयाल - कंजंक्टिवाइटिस


मानसून के दौरान आंखों में कुछ विशेष प्रकार के रोंगों की आशंका बढ़ जाती है जिसमें कंजंक्टिवाइटिस मुख्य हैं। इस रोग में आंखों में लालिमा, खुजली, जलन, आंखें चिपकना व धुंधला दिखाई देना जैसे लक्षण हो सकते हैं जानते हैं इस रोग से बजाव के बारे में।

एलर्जिक कंजंक्टिवाइटिस : इस रोग में पीड़ित व्यक्ति की आंखों में तेज खुजली, लालिमा, सूजन, जलन व भारीपन जैसे लक्षण हो सकते हैं।

बैक्टीरियल कंजंक्टिवाइटिस : आंखों में चुभन, लालिमा, व पानी आना जैसे लक्षण इस रोग में होने लगते है। पीड़ित व्यक्ति को इस दौरान अपना तौलिया/ रुमाल/ कपड़े आदि अलग रखने चाहिए ताकि संक्रमण दूसरे व्यक्तियों में ना फैले।

वायरल कंजंक्टिवाइटिस : इससे आंखों में लालिमा व धुंधला दिखाई देने जैसे लक्षण हो सकते हैं। यह वायरल आई फ्लू एडीनोवायरस (टाईप 8 व 19) से हो सकता है। इससे कभी-कभी कानों के पास कनपटी पर सूजन भी हो सकती है और कॉर्निया में सूक्ष्म जख्म होने से दिखना भी कम हो जाता है। यह एक या दोनों आंखों को प्रभावित करता हैं। इस समस्या के इलाज में देरी से धुंधलापन हमेशा के लिए भी हो सकता है।

कैमिकल कंजंक्टिवाइटिस : स्वीमिंग पूल में नहाने के बाद आंखों में खुजली, जलन या किरकिरी लगना आदि लक्षण हो सकते हैं।

सावधानी बरतें -

आंखों को रोजाना ठंडे पानी से 3-4 बार धोलें। मानसून में आंखों में सुखपन होता है इसलिए इन्हे रगड़े या मसलने नहीं।
अपना तौलिया या रुमाल आदि किसी के साथ शेयर न करें।
नियमित रूप से हाथों को धोएं। गंदे हाथों से आंखों को छूने से बचें वर्ना संक्रमण का खतरा रहता है।
मानसून के दिनों में आई मेकअप से परहेज करें। आंखों का कोई रोग होने पर विशेषज्ञ की सलाह के बाद ही आई ड्रॉप आदि का प्रयोग करें।

डॉ. सुरेश कुमार पाण्डेय, नेत्र सर्जन

Wednesday, 14 October 2015

Tips For Healthy Eye Care in hindi

Tips For Healthy Eye Care in hindi
In Hindi Eye care tips and treatment 


अच्छे विजन के लिए माउस और रिमोट नहीं, बच्चों को दें खेल के मैदान

बच्चों में चश्में का नंबर डायग्नोस नहीं हो पाने के कारण उनकी आंखों की रोशनी कम हो रही है। सही समय पर विजन की स्क्रीनिंग नहीं होने के कारण उनके चश्मा के नंबर डायग्नोस नहीं हो पाता है। इससे उनका विजन इतना कम हो जाता है कि उन्हे दिखना बंद हो जाता है। करीब पचास परसेंट बच्चे इसी वजह से अंधे हो जाते हैं। क्योंकी बच्चे के ब्रेन का सबसे ज्यादा विकास एक साल की उम्र मे ही होता है। वही एडल्ट्स में स्मोकिंग के कारण भी रेटिना पर इतना बुरा असर पड़ता है की विजन प्रभावित होता है।

ब्रेन विकास के लिए जरूरी कैटरेक्ट का इलाज-

माँ को प्रेग्नेंसी में न्यूट्रीशियस डाइट नहीं मिलने से या रूबैला जैसे इंफेक्शन होने से बच्चों में पैदाइशी कैटरेक्ट देखा जा रहा है। बच्चों में सिर्फ सर्जरी ही इसका इलाज है। मॉडर्न टेक्निक से 20 दिन से छोटे बच्चे की आंखों की सर्जरी करके इसे ठीक किया जा सकता है। अगर कैटरेक्ट समय पर नहीं निकाला जाता तो उसके ब्रेन का विकास नहीं हो पाता। साथ ही प्री मैच्योर न्यू बोर्न बच्चे, जिन्हें ऑक्सीज़न थेरेपी पर रखा जाता है, उनकी आंखों के परदे की जांच बेहद जरूरी है। 


धूप नहीं मिलने से भी नजर कमजोर-

जिन पेरेंट्स को चश्मा लगा है, उनके बच्चों में कमजोर नजर होने की संभावना ज्यादा होती है। आंखों का आकार बढने के साथ-साथ चश्मे का नंबर बढ़ता है। इसके अलावा घर के अंदर रहने और धूप नहीं मिल पाने के कारण भी चश्मे का नंबर बढ़ रहा है। पास की चीजों को बिना चश्मे के पूरी ताकत से देखने की कोशिश की जाती है तो भी नंबर बढ़ता है। इसलिए प्री-स्कूल में और हर 6 महीने के अंतराल में आई साइट को चैक जरूर करवाना चाहिए। चश्मे का नंबर बढ़ने से आंखों में तिरछापन आ जाता है। साथ ही उनमें कुछ भेंगापन भी आने लगता है। चश्मा नियमित रूप से पहनने से कुछ तरह का भेंगापन खत्म हो जाता है। भेंगेपन को ऑपरेशन से भी ठीक किया जा सकता है। 


चश्मे का नंबर कैसे घटाएं

बच्चों में सही समय पर कमजोर नजर की जांच न होने पर, दिमाग के साइट सेंटर का विकास प्रभावित होता है। दो साल के बच्चों में आजकल माइनस दस या बारह नंबर तक चश्मा आम हो गया है। यह नंबर बहुत ज्यादा है। चश्मे का नंबर कम करने के लिए पूरा समय चश्मा लगाएं। हाल ही में हुई मेडिकल रिसर्च में सामने आया है कि जो बच्चे टीवी, लैपटॉप और मोबाइल कि स्क्रीन पर लगातार काम करते हैं, उनकी नजर तेजी से कमजोर होती है। इसलिए बच्चों को ज्यादा से ज्यादा आउटडोर एक्टिविटीज में बिजी रखें। स्क्रीन नहीं, खेलने के लिए मैदान और पार्क में भेजें।        

रोशनी बढ़ाने के लिए क्या दें बच्चों को : -

डेयरी प्रोडक्ट्स, अखरोट, अंजीर, बादाम, हरी सब्जी, अल्सी के बीज।

डॉ. समरेश श्रीवास्तव, ऑप्थेल्मोंलॉजिस्ट