Friday, 8 January 2016

Curly Hair Care Tips in Hindi

ऐसे करे कर्ली बालों को सही तरीके से मैनेज  -Natural Curly Hair Care Tips in Hindi


Read Natural Curly Hair Care Tips: कर्ली बालों को सही तरीके से मेंटेन करने और उनकी खूबसूरती बढ़ाने के कुछ आसान तरीक

बाल soft रहें इसके लिए आपको जरूरत है conditioner की। जब भी शैम्पू करें, तो उसके बाद hair conditioner लगाएं। 

क्या आप बालों को सुखाने के लिए रोज hair dryer इस्तेमाल करती है? अगर ऐसा है तो ये curly hairs के लिए सही नहीं है। dryer के बिना काम नहीं चलता तो आप ऐसे dryer खरीदें जिसमें डिफ्यूजर हो। इससे बालों पर ज्यादा एरिया में गरम हवा फैलती हैं, जिससे बाल महफूज रहते हैं। 
curly hair care tips
Curly Hair Care Tips
कर्ली बालों में सबसे जरूरी होता सही समय पर सुलझाना, क्योंकि ड्राय बालों में कंघी करने से बालों को ज्यादा नुकसान होगा। बालों को उस वक्त सुलझाएं जब वो गीले या हल्के गीले हों। 

बालों को धोने के बाद कभी भी उसे भारी-भरकम मोटे तौलिए में न लपेटें। ऐसा करने पर बाल टूटने लगते हैं। हाथों से बालों के पानी को निचोड़कर निकाल दें। फिर बालों को किसी पतले और नरम तौलिए में लपेटें। अगर ऐसा तौलिए नहीं है तो आप उसकी जगह old cotton T-shirt का इस्तेमाल का सकते हैं। 

Moisture की कमी होने से कई बार curly hair अजीब से दिखते हैं। बालों में moisture बनाए रखने के लिए हफ्ते में एक बार किसी अच्छे hair mask का इस्तेमाल करें। घर में हेयर मास्क बनाना का चाहती हैं तो 2 चम्मच दही को 1 चम्मच ऑलिव ऑइल या बादाम के तेल के साथ मिलाकर इस्तेमाल कर सकती हैं। 

Hair brush उन बालों के लिए सही है जो बैठे होते हैं। कर्ली बालों को कंघी करने के लिए अपनी उगलियों का इस्तेमाल करें। इसके अलावा चौड़े-दांतों वाली कंघी का भी प्रयोग किया जा सकता है। 

रूखापन और बालों में शाइन की कमी होना कर्ली बालों की एक बड़ी समस्या है। चमक बनाए रखने के लिए शैम्पू करते वक्त ठंडे या हल्के गर्म का इस्तेमाल करें। गरम पानी का इस्तेमाल करने से बाल झाड़ू जैसे रूखे दिखते हैं। 

कॉटन का तकिया कवर इस्तेमाल करने से बाल उसमे चिपककर टूट जाते हैं। ये बालों का नेचुलर ऑइल और मॉइश्चर खींचकर उन्हें रूखा और बेजान बना देता है। सिल्क और साटिन का कवर बालों का टूटना कम करता है। 

बाल काटने के दूसरे दिन ही बाल ऐसे लगते हैं जैसे कोई हेयर कट कराया ही न हो। ऐसा इसलिए क्योंकि पार्लर में बाल गीले कर के कटे जाते हैं। जब भी कर्ली बालों को कटवाने जाए तो हमेशा ड्राय कटिंग ही कराएं।



Osteomyelitis -Do not Avoid fever and pain in children

Osteomyelitis - Do not Avoid fever and pain in children - बच्चों में बुखार व तेज दर्द को न टालें 


Do not Avoid fever and pain in children: बच्चों में सर्दी के साथ तेज बुखार, किसी विशेष अंग में तेज दर्द, सूजन व अंग लाल हो जाए तो यह Osteomyelitis (हड्डी का संक्रमण)  की समस्या हो सकती है। देर किए बैगर चिकित्सक से परामर्श करें। यदि समय रहते इसकी पहचान कर इलाज करा लिया जाए तो दवाओं से ठीक हो सकती है। लेकिन अधिक समय तक अनदेखी करने या सही इलाज न मिल पाने की स्थिति में हड्डी में विकृति भी आ सकती है।

हालांकि विकृति के बाद भी कई तकनीकों से इलाज संभव है। इनमें से एक एडवांस्ड तकनीक है ऑर्थो एसयूवी (एक कम्प्यूटर बेस्ड प्रोग्राम) इसका प्रयोग हाथ पैरों की विकृति ठीक करने के लिए किया जाता है। 

हाल ही एक 13 वर्षीय किशोर के पैर की विकृति ठीक करने के लिए पहली बार प्रयोग किया गया। इसमें रोगी को एसयूवी फ्रेम पहनाया जाता है। इस फ्रेम में छह डिस्ट्रेक्टर (रॉड) होते हैं जो हड्डी का आकार बढ़ाने-घटाने में सहायक होते हैं। फ्रेम पहनाकर मरीज की मौजूदा स्थिति की पूरी जांच की जाती है व सारी जानकारी जैसे अंग कितना बड़ा-छोटा है या कितना टेढ़ा है आदि सॉफ्टवेयर मे फीड कर दी जाती है। समान्यत: करीब एक इंच हड्डी को बढ़ाने, सीधा व मजबूत करने में तीन माह का समय लगता है। 

मरीज को फ्रेम कब तक पहनना है, जरूरत के हिसाब से विशेषज्ञ इसका निर्धारण करते हैं। इस बीच मरीज को डिस्ट्रेक्टर का आकार बढ़ाना-घटाना होता है। किस डिस्ट्रेक्टर को कब और कितना बड़ा-छोटा करना है यह जानकारी सॉफ्टवेयर में फीड डाटा से मिलती है। चिकित्सक इसका विस्तृत ब्योरा प्रिंटआउट के रूप में मरीज को देकर घर भेज देते हैं। इस बीच कोई परेशानी न हो इसके लिए उसे कुछ समय के अंतराल पर फॉलोअप के लिए बुलाते हैं। एक बार पूरी तरह ठीक होने के बाद वह समान्य जीवन जी सकता है। 


डॉ. डी. एस. मीणा,  
सीनियर प्रोफेसर,
SMS

दमा Asthma Precautions in Hindi

सीओपीडी (chronic obstructive pulmonary disease) means दमा Asthma Precautions in Hindi 

दमा में धूम्रपान से सांस नली में बढ़ती है सूजन 

दमा Asthma Precautions  - COPD (chronic obstructive pulmonary disease) दमा सांस संबंधी रोग है। इसमें श्वसन लेने में तकलीफ, बार-बार खांसी व कफ आने की समस्या होने लगती है। यदि ऐसे मरीज कुछ बातों का ध्यान रखें तो बीमारी को बढ़ने से रोक सकते है-

धूम्रपान करने से सांसनली में सूजन बढ़ती है जिससे कफ की समस्या भी अधिक हो जाती है इसलिए इससे पूरी तरह परहेज करें। साथ ही धूम्रपान करने वाले लोगों से भी दूरी बनाएं। 

दमा Asthma Precautions in Hindi

परफ्यूम, डिओ, क्लीनिंग स्प्रे या किसी अन्य तरह की तेज गंध, धूल व धुएं से बचें। इनसे दमा के अटैक का खतरा बढ़ने की आशंका रहती है। 

ऐसे लोग खाने में प्रोटीनयुक्त आहार जैसे दालें, सोयाबीन व हरी सब्जियां लें और अधिक से अघिक पानी पिएं। 

योग-प्राणायाम व एक्सरसाइज को दिनचर्या का हिस्सा बनाएं। 

विशेषज्ञ के निर्देशानुसार समय पर दवाएं, इन्हेलर प्रयोग करें। 

  डॉ॰ एम॰ के॰गुप्ता 
  एलर्जी व चेस्ट विशेषज्ञ       




Skin Care Treatment micro needling in Hindi

Skin Care Treatment in Hindi - चमकती त्वचा के लिए नेचुरल तरीके Treatment


Skin Care Treatment in Hindi: दमकती त्वचा के लिए मार्केट में कई अल्टरनेटिव ब्यूटी ट्रीटमेंट उपलब्ध हैं। कितने फायदेमंद हैं ये नेचुरल तरीके - 

ट्रीटमेंट : Micro Needling -

क्या है - ये smooth skin के लिए painless प्रोसिजर है। इसमें needle covered device को चेहरे पर घुमाया जाता है, जिससे त्वचा में छोटे-छोटे, टेम्पररी प्रिक्स आएं। इससे बेहतर बनता है। त्वचा भी tight होती है। 

फायदेमंद है क्या - इससे कोलेजन का उत्पादन बढ़ता है। झुर्रियों का असर भी कम होता है। एकेन के निशानों से छुटकारा मिलता है। एक माह तक ऐसा करने से त्वचा लंबे समय तक युवा दिखने लगती है। जिन लोगों की त्वचा सेंसेटिव या पतली होती है, उनकी त्वचा पर यह तरीका फायदेमंद रहता है, लेकिन इस तरीके को अपनाने से पहले विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें। 
Skin Care Treatment micro needling in Hindi

ट्रीटमेंट : क्लेन्ज

क्या है - रेगुलर डाइट पर पाबंदी लगाने से चेहरे की चमक लौट आती है। 

फायदेमंद है क्या - जूस या फ्रूट डाइट पर आने से शरीर में से टॉकिसन्स निकल जाते हैं। digestive system को आराम मिलता है। खाना न खाने से वो चीजें भी दूर हो जाती हैं, जिनसे skin tissue प्रभावित होते हैं। जूस या फलों का सेवन करने से शरीर को पौष्टिक तत्व मिलते हैं। कुछ दिन कॉफी, शुगर, डेयरी प्रोडक्ट, मीट का सेवन न करने से चेहरे पर चमक लौट आती है।                                                      

Wednesday, 6 January 2016

Mirgi Ka Daura (Epilepsy) treatment in hindi

Mirgi Ka Daura (Epilepsy) Causes, Symptoms, Treatment, Diagnosis in hindi नई तकनीक साबित हो रही है मिर्गी के इलाज में कारगर - What is Mirgi Attack in hindi

Mirgi Ka Daura (Epilepsy) - मिर्गी का सटीक इलाज प्रत्यक्षदर्शी द्वारा बताए गए विवरण व हिस्ट्री पर निर्भर करता है, लेकिन कुछ मामले ऐसे होते हैं जिनमें यह पहचानना मुश्किल होता है कि यह टु सीजर (मिर्गी) है या फिर स्यूडो सीजर (हिस्टीरिया)। इसमें तकनीक अहम भूमिका निभा सकती है। ऐसी ही एक तकनीक है मोबाइल फोन जिससे डॉक्टर मिर्गी रोग की पहचान आसानी से कर  सकते हैं। अगर किसी मरीज को दौरा पड़े तो तुरंत मोबाइल पर उसकी वीडियो रिकॉर्डिंग का लेने से इलाज में सहूलियत हो जाती है। मिर्गी पूरी तरह ठीक हो सकती है बेशर्ते इसकी पहचान समय पर हो व मरीज डॉक्टर द्वारा बताई दवाइयां नियमित लेते रहें।

What is Mirgi Attack in hindi
Mirgi Attack 
किसी व्यक्ति को मिर्गी रोग होने की आशंका हो तो उसके परिजनों, दोस्तों आदि को चाहिए कि वे मोबाइल से दौरों की वीडियो रिकॉर्डिंग कर लें व डॉक्टर को दिखाएं। इससे वे आसानी से पता लगा सकेंगें कि यह टु सीजर है या स्यूडो सीजर (sudo caesar epilepsy)। इससे रोग की पहचान व इलाज में मदद मिल सकती है। 

क्या है मिर्गी (What is Mirgi Attack) मस्तिष्क में सूचनाओं के आदान-प्रदान के दौरान विधुत प्रवाह अचानक असामान्य रूप से बढ़ जाए तो मांसपेशियों में अनियंत्रित हरकतें दिखने लगती हैं। इसे फिट आना या सीजर कहते हैं। बार-बार सीजर आने से यह मिर्गी का रूप धारण का लेता है। नियमित दवा लेने से पूरी तरह ठीक हो सकती है यह बीमारी। 

Test to Identify Mirgi Attack - 

वीडियो ई.ई.जी. - इसमे मशीन से मस्तिष्क की ई.ई.जी. व वास्तविक शारीरिक क्रियाओं की 2 घंटे की वीडियो रिकॉर्डिंग होती है। इससे ई.ई.जी. के विश्लेषण में मदद मिलती है। 

एम्बुलेटरी ई.ई.जी. - यह मुश्किल व जटिल मामलों में होती है। इसमे 24घंटे तक की ई.ई.जी. रिकॉर्ड की जाती है। इस दौरान मरीज दिनचर्या के कार्य कर सकता है। 

एम.आर.आई. - यह रूटीन जांच है। एपीलेप्सी प्रोटोकॉल का उपयोग कर एम.आर.आई. जांच से मस्तिष्क के विकारों को पहचानने में मदद मिलती है। 

दौरा आने पर - मरीज को किसी एक साइड करवट से लेटा दें, कपड़े ढीले कर दें, शरीर को दबाएं नहीं, तलवे न रगड़े, प्याज, जूते, चप्पल, मोजे आदि सुंघाएं। मुंह मे दवा या कोई अन्य चीज जबरदस्ती न डालें, इससे मरीज के दांत टूटने, ब्लीडिंग या सांस लेने में तकलीफ हो सकती है। चेहरे पर पानी के छीटें भी न मारें। भीड़ इकट्ठी न होने दें। आमतौर पर कुछ मिनटों में मरीज खुद ही सामान्य  जाता है। 

मरीज ध्यान रखें - रात में 7 व दिन में 1 घंटे की नींद जरूर लें। 6 माह में एक बार भी दौरा न आने पर ही ड्राइविंग करें। बाइक चलाते समय हेलमेट पहनें। ऐसा कोई व्यायाम या खेल न खेलें जिनसे सिर में चोट लगने का खतरा हो। दवा व खाना समय पर लें। 

दौरा पड़े तो स्प्रे करें दवा मिर्गी के उपचार के लिए कई दवाएं, स्प्रे व इंजेक्शन उपलब्ध हैं। लेकिन दौरा आने की स्थिति में डॉक्टर द्वारा निर्देशित मात्रा से स्प्रे करना मददगार साबित होता है। 

शल्य क्रिया - ऑपरेशन की जरूरत महसूस होने पर रोग की सही पहचान में इनवेजिव ई.ई.जी. स्पेक्ट, पैट स्कैन व एंजिओग्राफी सहायक होती हैं। 

डॉ॰ आर॰ एस॰ जैन, न्यूरोलॉजी के वरिष्ठ आचार्य व यूनिट हैड SMS



Avoid Mosquito Coil and use लहसुन व नीम

Avoid Mosquito Coil - मच्छर भगाने वाली कॉइल से अच्छे लहसुन व नीम - Mosquito Coil harmful effects on body in Hindi

Mosquito Coil harmful effects - मच्छरों से बचने के लिए मॉस्कीटो कॉइल या क्रीम के बजाय नीम का तेल और लहसुन बेहतर विकल्प हैं। भोजन में रोजाना लहसुन खाने और तवचा पर नीम का तेल के इस्तेमाल से कोई दुष्प्रभाव नहीं होता, समस्या से भी राहत मिलती है। 
Mosquito Coil harmful effects on body in Hindi
Mosquito Coil Harmful Effects
हालांकि सबसे अच्छा विकल्प तो मच्छरदानी ही है। इसके अलावा कॉइल का धुआं स्वास्थ्य के लिए भी हानिकारक होता है। इंडियन टैस्ट रिचर्च फाउंडेशन के एक सर्वे में यह खुलासा हुआ है कि एक मॉस्कीटो कॉइल से निकला धुआं सौ सिगरेट के धुएं के बराबर खतरनाक होता है। 

एक शोध में भी फेफड़ों के कैंसर के 50 प्रतिशत मरीजों में रोग की वजह मॉस्कीटो कॉइल का धुआं का पाया गया है। दरअसल मॉस्कीटो कॉइल में पिरेथ्रम रसायन होता है। जो मच्छरों को अंधा बनाकर मार देता है। यह रसायन अस्थमा व अन्य सांस और फेफड़ों संबंधी रोगों का खतरा बढ़ाता है।

Water Benefits For Body in hindi

Water Benefits For Body in hindi - ज्यादा पानी से कम होगा गठिया का दर्द - Drinking Water benifits for Arthritis patients

Drinking Water benifits for Arthritis patients -जाडों में गठिया की समस्या बेहद परेशान करती है। ऐसे में गठिया के मरीजों को रोजाना आठ लीटर पानी जरूर पीना चाहिए। शोध के अनुसार शरीर में पानी की कमी से रक्त में यूरिक एसिड बढ़ने के साथ विषैले पदार्थ सक्रिय हो जाते हैं। इससे जोड़ों में अकड़ना, दर्द और खिंचाव आने लगता है। ऐसे मे ज्यादा पानी पीना फायदेमंद साबित होता है |

ज्यादा पानी से कम होगा गठिया का दर्द
ज्यादा पानी से कम होगा गठिया का दर्द 
कई रिसर्च में यह तथ्य भी सामने आया है कि गठिया का दर्द अक्सर देर रात या तड़के ज्यादा होता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि इस मौसम में काफी देर तक एक ही अवस्था में पड़े रहने से जाइंट में जकड़न व ठंडापन आ जाता है। मरीज जोड़ों की देखभाल के लिए पौष्टिक व संतुलित खानपान लें और शारीरिक रूप से सक्रिय रहें।                                                                             
  


अंजीर के फायदे Anjeer (Fig) Health Benefits Fayde in Hindi

अंजीर, अंकुरित गेहूं एवं बोक चोय के फायदे Anjeer (Fig) Health Benefits Fayde in Hindi 

अंजीर के फायदे - हफ्ते में 2 से 3 बार कुछ खास चीजों को भोजन की थाली में शामिल करके आप खुश रहने की तरकीब सीख सकते हैं।अंजीर आपका मूड अच्छा बनाए रखने मे सहायता करता है | 

अंजीर के फायदे

अंजीर potassium, fiber and vitamin B का अच्छा स्त्रोत होता है। मोटापा नियंत्रित रखने के साथ मूड अच्छा रखने वाले serotonin hormone का उत्पादन बढाता है और कोलेस्ट्रॉल घटाता है। 

अंकुरित गेहूं : एक बड़ा चम्मच अंकुरित गेहूं आपके मैग्नीशियम की जरूरी मात्रा का 7 फीसदी दे सकता है। इससे मांसपेशियों में दर्द से राहत मिलती है। यह विटामिन-ई, फोलेट और फाइटोन्यूटीएंट का बेहतर स्त्रोत है। इसमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट्स आपको कई रोगों से बचाते हैं। 

बोक चोय (Bok Choy) : इस सफ़ेद पत्तागोभी के नाम से भी जाना जाता है। यह पाचनतंत्र दुरुस्त करती है। एक कप कटी हुई बोकचोय से 158 मि.ग्रा. कैल्शियम मिलता है जो ओस्टियोपोरोसिस से बचाव करने में मददगार है।           

Kalonji Oil Benefits in Asthma treatmenti

अस्थमा में फायदेमंद कलौंजी का प्रयोग - Kalonji (black Cumin) Oil Benefits in treatment

कलौंजी (black cumin) health benefits न सिर्फ खाने का स्वाद बढ़ाती है बल्कि इसे Asthma में औषधि के रूप में भी प्रयोग किया जा सकता है। कलौंजी में थाइमोक्वीनोन नामक तत्व पाया जाता है जो इस बीमारी से लड़ने में कारगर है। इसका नियमित प्रयोग अस्थमा के मरीजों के लिए लाभदायक साबित हो सकता है। 


कलौंजी (black cumin) health benefits
कलौंजी (black cumin) health benefits
इस्तेमाल का तरीका :-

इसको पीसकर पाउडर बना लें। 2-5 ग्राम (आधे-एक चम्मच) सुबह-शाम गुनगुने पानी के साथ ले सकते हैं। 

कलौंजी का तेल भी बाजार में उपलब्ध है। एक कप गर्म पानी में आधा चम्मच तेल डालकर एक चम्मच शहद मिला लें। इसे सुबह खाने व रात में सोने से पहले लेना अस्थमा रोग के मरीजों के लिए फायदेमंद है। 

कलौंजी के दानों को रोज़मर्रा में दाल-सब्जियों आदि में डालकर प्रयोग करना भी अच्छा रहता है। कुछ दानों या तेल को पानी में उबालकर भाप लेने से भी राहत मिलती है। ऐसा करते समय सिर को तौलिए से ढकें व आंखें बंद करके लंबी सांस लें जिससे भाप फेफड़ों तक पहुंच सके। 

इसके तेल को गुनगुना करके 1-2 बूंद नाक के ऊपर डालकर मालिश करना भी असरकारी है। 

वैद्य भानुप्रकाश शर्मा, 
आयुर्वेद विशेषज्ञ
  

Fruits and Vegetables which should avoid at Dinner

Fruits and Vegetables which should avoid at Dinner रात के खाने मे कौनसी सब्जी को चुने और कौनसी सब्जी को नहीं खाएं 

Fruits and Vegetables which should avoid at Dinner फल-सब्जियां जो रात में बढ़ाते हैं परेशानी -


कटहल: भारी होने के कारण यह अपच की समस्या करता है। 
चने का साग: इसमें खट्टापन होने से एसिडिटी हो सकती है।
गोभी व मटर: आसानी से नहीं पचते। इनमें बदहजमी होने की आशंका रहती है।
बैंगन-अरबी: गरिष्ठ होने के कारण पेट दर्द हो सकता है। 
टमाटर: इसकी सब्जी बनाकर खाई जा सकती है। लेकिन सलाद के रूप में खाने से बचें।

इन्हें खाना बेहतर - 

लौकी, तुरई, परवल, सेम, कंदुरु, करेला, टिंडा, ककोड़ा, पालक, चोलाई, गाजर व बथुआ की सब्जी बनाकर खाई जा सकती है क्योंकि ये हल्की व सुपाच्य होती हैं। 

ये फल बढ़ाते हैं परेशानी -

केला: इससे कब्ज की समस्या हो सकती है। 
खरबूज-तरबूज: ये खट्टे होते हैं साथ ही पित्त ज्यादा बनाते हैं। 
बेर: भारी होने के कारण इससे पेटदर्द हो सकता है। 
अमरूद: शीत की तासीर होने से यह कफ-पित्त संबंधी दिक्कतें बढ़ा सकता है। 

इनसे नहीं है नुकसान-

सेब, पिंडखजूर, अंगूर, शहतूत व खिरनी आसानी से पच जाते हैं इसलिए इन्हें रात के समय खा सकते हैं। 

                                          वेद्य पदम जैन 
    

खजूर Khajur (dates) Ke Fayde health benefits in hindi

खजूर के फायदे और गुण- खजूर Khajur (dates) Ke Fayde health benefits in hindi

Khajur (dates) health benefits in hindi - सेहत के लिहाज से सर्दियों में खजूर खाना फायदेमंद माना जाता है। तासीर में गर्म होने के साथ इसमें कई तरह के पोषक तत्व भी पाए जाते हैं जो शरीर को अलग-अलग तरीकों से लाभ पहुँचते हैं। 

Khajur Ke Fayde
Dates health benefits in hindi
शुगर का स्तर नियंत्रित: अगर कुछ मीठा खाने का मन करे तो कैंडी या डेजर्ट के बजाय दो-तीन खजूर खा लें। इससे मीठे की तलब भी मिट जाएगी साथ ही शुगर का स्तर नियंत्रित रहेगा।

हार्टअटैक की आशंका कम:  डब्ल्यूएचओ के मुताबिक शरीर में पोटेशियम की कमी से ह्रदय संबंधी रोगों का खतरा बढ़ता है। खजूर में भरपूर मात्रा में पोटेशियम पाया जाता है। इसके अलावा यह शरीर में एलडीएल कोलेस्ट्रॉल (खराब कोलेस्ट्रॉल) को भी जमा होने से रोकता है। जिससे हाइपरटेंशन, दिल का दौरा आदि का जोखिम कम होता है। 

पाचनक्रिया सुधारे : फाइबर का अच्छा स्त्रोत होने के कारण इससे पाचनक्रिया में सुधार होता है।

एनीमिया से बचाव : इसमे आयरन की प्रचुर मात्रा पाई जाती है जो शरीर में रक्त की वृद्धि करने में सहायक है। नियमित रूप से रोजाना 4-5 खजूर खाने से एनीमिया से बचाव होता है।

हड्डियों के लिए फायदेमंद : खजूर में कैल्शियम, मैग्नीशियम और विटामिन-बी पाया जाता है जो हड्डियों की मजबूती के लिए आवश्यक हैं। विटामिन-बी प्रोटीन को तोड़ने और तंत्रिका के कार्यों में मददगार है। इसे रोजाना खाने से आर्थराइटिस के मरीज को भी दर्द में राहत मिलती है।

Tuesday, 5 January 2016

Indian Home Remedies for Joint Pain Relief in Hindi

घरेलू नुसख़ों से राहत Indian Home Remedies for Joint Pain and 

Low and Lower Back Pain Relief in Hindi


Joint Pain and Low or Lower Back Pain Relief के लिए कुछ घरेलु उपचार किए जा सकते हैं | जोड़ों में दर्द के अलावा कई बार कमर में असहनीय दर्द होने पर भी समस्या बढ़ जाती है। ऐसे में ये घरेलू उपचार लेने से फायदा मिलता है -  

joint pain home remedy

1. लहसुन का पेस्ट बनाकर आधे घंटे के लिए दर्द वाले स्थान पर लगाएं। इसके बाद गर्म पानी से धो लें।

2. लहसुन के तेल से मालिश करें। खाली पेट लहसुन की 2-3 कलियां खाना भी इस रोग से पीड़ित लोगों के लिए लाभकारी है। इसका शरीर पर कोई दुष्प्र भाव नहीं होता।

3. लेमनग्रास ऑयल में दोगुनी मात्रा में नारियल तेल मिलाएं और मालिश करें। 

4. पान के पत्ते के जूस को नारियल तेल में मिलाकर मालिश करने से दर्द में आराम मिलता है।   

Pregnancy Trimester Stages and Week

Pregnancy Trimester Stages गर्भावस्था तीन ट्राइमेस्टर 
डिलवरी में न आए परेशानी इसलिए ये हफ़्तेवार प्लान 

पहला ट्राइमेस्टर - ( 0-12 वां सप्ताह ) Week 1 through week 12
दूसरा ट्राइमेस्टर - ( 13वें से 26वें सप्ताह )  week 13 to week 27
तीसरा ट्राइमेस्टर - ( 27वें से 40वां सप्ताह ) week 28 to the birth

Pregnancy Trimester Stages - गर्भावस्था के दौरान कुछ बातों का ध्यान रखने और व्यायाम करने से गर्भावस्था हर स्त्री के लिए और भी सुखद अनुभव बन जाएगा। गर्भावस्था 40 सप्ताह की होती है। इन 40 सप्ताहों को तीन ट्राइमेस्टरों में बांटा गया है। इन 40 सप्ताहों में गर्भवती महिला का वजन 10-15 किलोग्राम बढ़ाना जरूरी होता है। इससे कम या ज्यादा होने पर विशेषज्ञों की सलाह लें। 

Pregnancy trimester
Pregnancy trimester Stages
पहला ट्राइमेस्टर - ( 0-12 वां सप्ताह ) जिस सप्ताह मासिक चक्र नहीं होता, उससे 12वें सप्ताह तक का समय। इस दौरान उल्टी होना, जी घबराना आम समस्याएं हैं। उसकी रोकथाम के लिए समय पर भोजन करें, सम्पूर्ण आहार लें, अधिक मात्रा में पानी पीएं, खुद को ठंडा रखें, और थकावट महसूस होने पर आराम करें। कुछ हल्के-फुल्के व्यायाम करें- जैसे टहलना, (10-15 मिनट), स्ट्रेचिंग, नाक से गहरी सांस भरना और मुंह से छोड़ना, पैरों के पंजे चलाना, कीगल्स एक्सरसाइज (पेल्विक फ्लोर स्ट्रेन्थनिंग एक्सरसाइज) करिए। व्यायाम के दौरान नमक, शक्कर, पानी का घोल पीते रहिए और व्यायाम के पहले व बाद में थोड़ नाश्ता जरूर करें। 

दूसरा ट्राइमेस्टर - ( 13वें से 26वें सप्ताह ) इस दौरान बच्चे का विकास अधिक तेजी से होता है। बच्चे को अधिक मात्रा में आयरन और पोषक तत्वों की जरूरत रहती है, इसलिए सम्पूर्ण आहार लें। विशेषज्ञ की सलाह से आयरन सप्लीमेंट्स खाएं। इस दौरान गर्भवती स्त्री के शरीर को प्रसव के लिए तैयार करता है एवं यह हॉर्मोन जोड़ों पर भी प्रभाव डालता है, जिसके कारण मोच आना, संतुलन बिगड़ना एवं गिरना अमूनन हैं। इसलिए व्यायाम करते समय सावधानी बरते अच्छे सपोर्टिव जूते पहनें, शरीर को थकने न दें, भरपूर नींद लें, हल्के-फुल्के व्यायाम करें। खुदे को ठंड और शांत रखें।

तीसरा ट्राइमेस्टर - ( 27वें से 40वां सप्ताह ) 38वें से 42वें सप्ताह के बीच होने वाले प्रसव को फुल टर्म डिलीवरी कहते हैं। 36वें सप्ताह से पहले का प्रसव प्री-मेच्योर डिलिवरी कहलाता है। इस ट्राइमेस्टर में गर्भ का आकार बढ़ने से कमर दर्द से राहत के लिए उचित व्यायाम और आराम करें। पूरी नींद लें। थोड़ा-थोड़ा खाते रहें। अधिक मात्रा में पानी, सलाद-सब्जियों और फलों से सेवन से कब्ज दूर होगी। पंजो की सूजन के लिए पैरों को 2 तकियों पर ऊंचा रखें और पंजे 30 मिनट तक चलाएं। 



OGT Test During Pregnancy in Hindi

Oral Glucose Tolerance (OGT) Test during Pregnancy 

OGT test will help to detect an early stage of diabetes Type 2


Pregnancy में पता चलने वाले diabetes को Gestational Diabetes (जीडीएम) कहते हैं। GDM का मतलब है कि आपके शरीर में टाइप-2 डायबिटीज़ का खतरा ज्यादा है। डिलिवरी के बाद प्रेग्नेंसी हॉर्मोन्स में गिरावट आने के कारण ब्लड शुगर लेवल नॉर्मल लेवल संतुलित हो जाता है, इसलिए एंटीडायबिटिक मेडिकेशन की जरूरत भी नहीं होगी, लेकिन टाइप-2 डायबिटीज़ का खतरा बना रहता है। 

कई शोध के अनुसार जो महिलाएं जीडीएम की शिकार होती हैं, उनमें से 30 से 50 फीसदी महिलाओं में डिलिवरी के 5 से 10 वर्ष में टाइप-2 डायबिटीज़ का खतरा रहता है। अलग प्रेग्नेंसी में जीडीएम का खतरा 70 फीसदी तक रहता है। इस बीमारी का पता ब्लड टेस्ट से ही लग सकता है। 
OGT Test
OGT Test
6 से 12 सप्ताह की Pregnancy के दौरान दो घंटे 75 ग्राम ओरल ग्लूकोज टॉलरेंस टेस्ट (OGT) कराना चाहिए। अगर 2 hour OGT Test का नतीजा negative आता है तो हर तीन वर्ष में टेस्ट दोबारा कराने को कहा जाता है। 

सही समय पर इलाज न होने के कारण हाई ब्लड ग्लूकोज के कारण आंखों, पैरों या किडनी की समस्या हो सकती है। चूंकि आप जानते हैं कि टाइप-2 डायबिटीज़ का रिस्क ज्यादा है, इसलिए बीमारी को कंट्रोल करना और भी जरूरी है। जिस महिला का वजन संतुलित होता है या जो ज्यादा एक्टिव रहती है, उसे टाइप-2 का खतरा कम होता है। 

प्रेग्नेंसी में वॉक करना या संतुलित आहार खाने से बच्चे में टाइप-2 का खतरा टल जाता है। इन समस्याओं से दूर रहने के लिए रेगुलर स्क्रीनिंग कराएं। प्री-डायबिटीज़ का पता चलने पर भी टाइप-2 का खतरा टल सकता है। 

टेस्ट पूरे होने के बाद अगर डायबिटीज़ का पता चलने पर ब्लड ग्लूकोज लेवल को कंट्रोल किया जा सकता है। इससे अगली प्रेग्नेंसी में कोई समस्या नहीं आती है। सही वक्त पर diagnose न होने पर और ब्लड शुगर बढने से नवजात पर बुरा असर पड़ेगा। अच्छी डाइट और लाइफस्टाइल में थोड़े बदलाव के साथ सही ट्रीटमेंट से समस्या का हल निकल सकता है, इसलिए OGT Test समय पर कराएं।  

डॉ॰ एसके वॉन्गनू 
एंडोट्रायनोलॉजिस्ट, अपोलो हॉस्पिटल 

Misconception and Myths about Antibiotics

एंटीबॉयोटिक्स के बारे में कुछ गलत धारणाएं - Misconception and Myths about Antibiotics

विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक सर्वे में एंटीबॉयोटिक्स दवाइयों के संबंध मे व्याप्त गलतफहमियों का खुलासा हुआ है। सर्वे में 12 देशों के लगभग दस हजार लोंगों की राय जानी गई थी। कुछ आम गलत धारणाओं पर गौर कीजिए।

गलतफहमी 1 - डॉक्टर द्वारा बताई गई एंटीबॉयोटिक्स की पूरी खुराक लेने की जरूरत नहीं है। 32% लोग मानते हैं, अच्छा महसूस करने के बाद एंटीबॉयोटिक्स बंद कर देना चाहिए। लेकिन, पूरा कोर्स नहीं लेने का अर्थ है कि इन्फेक्शन का पूरी तरह इलाज नहीं हो पाएगा। प्रतिरोध पैदा हो सकता है।

गलतफ़हमी 2 – एंटीबॉयोटिक्स प्रतिरोध यानी शरीर पर दवाइयों का असर नहीं होता है। 76% लोग सोचते हैं, यह सच है। जबकि सचाई यह है कि बैक्टीरिया प्रतिरोधी हो जाता है और बीमारी फैलाता है।

गलतफ़हमी 3 - नियमित तौर पर एंटीबॉयोटिक्स का उपयोग करने वाले लोगों को ही खतरा रहता है। 44% लोग इस पर विश्वाश करते हैं। लेकिन, किसी को भी ऐसा इन्फेक्शन हो सकता है जो एंटीबॉयोटिक्स का प्रतिरोधी है।

गलतफ़हमी 4 – एंटीबॉयोटिक्स से सर्दी, फ्लू का इलाज संभव है। 64% लोगों का मानना है, एंटीबॉयोटिक्स से सर्दी भागती है। सर्दी वायरस से होती है। एंटीबॉयोटिक्स का उपयोग केवल बैक्टीरिया के खिलाफ होता है।



Chemotherapy and hair loss- why does hair fall out during chemo

Chemotherapy and hair loss- why does hair fall out during chemo कीमोथैरेपी में इसलिए उड़ जाते हैं बाल 

कैंसर के इलाज में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाली किमोंथैरेपी की प्रक्रिया के बाद अक्सर सिर के बाल उड़ जाते हैं, शरीर की प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो जाती है, और पाचन नली में सूजन आ जाती है। 
Chemotherapy and hair loss
Chemotherapy and hair loss
दरअसल, हर तरह के कैंसर का एक ही कारण है- कोशिकओं का अनियमित विकास। मानव शरीर की कोशिकाएं लगातार विभाजित होती रहती हैं। इसकी पांच स्तरीय प्रक्रिया होती है। जीवनकाल समाप्त होने के बाद कोशिकाएं खत्म हो जाती हैं। इसी प्रक्रिया में गड़बड़ी से कोशिकाओं का अनियंत्रित विकास होता है जो ट्यूमर और फिर कैंसर का रूप लेता है। 
कीमोथैरेपी की प्रक्रिया इस अनियंत्रित को नियमित करती है और खराब हुई कोशिकाओं को खत्म करती हैं। लेकिन इसे खराब और अच्छी कोशिकाओं के बीच का फर्क पता नहीं होता। इसलिए कैंसर से प्रभावित कोशिकाओं के अलावा शरीर बाकी अंगों पर भी असर पड़ता है और बाल उड़ने जैसे समस्याएं होती हैं।

Avascular Necrosis Causes, Symptoms Treatment

जब हड्डियां घिसने लगे- Avascular Necrosis (Osteonecrosis) Causes, Symptoms Treatment in Hindi


Avascular Necrosis हड्डियों की एक ऐसी स्थिति है, जिसमें बोन टिश्यू यानी हड्डियों के ऊतक मरने लगते हैं। इस तरह की स्थिति तब उत्पन्न होती हैं, जब इन ऊतकों तक पर्याप्त मात्रा में रक्त नहीं पहुंच पाता है। इसे Osteonecrosis भी कहा जाता है। ऐसे लोग जो काफी लंबे समय से ज्यादा में मात्रा में steroids का इस्तेमाल करते हैं और ज्यादा शराब पीते हैं, उन्हें इस बीमारी के होने का खतरा ज्यादा रहता है। 


हड्डियां जब घिसने लगती हैं और खत्म होने के कगार पर पहुंच जाती हैं तो उसे Avascular Necrosis कहते हैं। हड्डी घिसने या जोड़ों के अलग होने के कारण उस हिस्से में रक्त आपूर्ति बाधित हो जाती है। यह किसी को भी हो सकती है, लेकिन 30 से 60 वर्ष की आयु वर्ग के लोगों को यह अपनी गिरफ्त में ज्यादा लेती है। 

लक्षण : कई लोगों में शुरुआती दौर में इस बीमारी के कोई भी लक्षण दिखाई नहीं देते हैं। जब स्थिति बहुत ज्यादा खराब हो जाती है, तब वजन उठाने पर जोड़ों में दर्द होने लगता है। और अंतत: स्थिति इतनी ज्यादा बिगड़ जाती है कि लेटे रहने पर भी जोड़ों में दर्द होता रहता है। इस बीमारी में मध्यम दर्जे का या बहुत तेज दर्द होता है और यह धीरे-धीरे बढ़ता जाता है। कूल्हे के एवैस्कुलर नेक्रोसिस होने पर पेडू, जांघ और नितंब में दर्द होता है। कूल्हे के अलावा इस बीमारी से कंधे, घुटने, हाथ और पैर के भी प्रभावित होने का खतरा बना रहता है। 

कारण : जोड़ों या हड्डियों में चोट लगना: जोड़ में किसी भी तरह का चोट या परेशानी जैसे जोड़ों के खुल जाने की वजह से उसके नजदीक की रक्त नलिकाएं क्षतिग्रस्त हो सकती हैं। 

रक्त नलिकाओं में फैट्स का जमाव : कई बार रक्त नलिकाओं में फैट्स का जमाव हो जाता है, जिससे ये नलिकाएँ संकरी हो जाती हैं। इससे हड्डियों तक रक्त नहीं पहुंच पाता है, जिससे उन्हें पर्याप्त पोषण नहीं मिल पाता है। सिकल सेल एनीमिया और गोचर्स डिजीज जैसी चिकित्सकीय स्थिति उत्पन्न होने पर भी हड्डियों तक पर्याप्त मात्रा में रक्त नहीं पहुंच पाता है। इन सबके अलावा कुछ ऐसे अनजाने कारण भी होते हैं, जिनकी वजह से यह बीमारी लोगों को अपनी गिरफ्त में ले लेती है। 

रिस्क फैक्टर : हड्डियों के घनत्व को बढ़ाने के लिए लंबे समय तक दवाएं लेने से केवल कैंसर मरीजों को जबड़ों के नेक्रोसिस होने का खतरा बढ़ जाता है। पैन्क्रिएटाइटिस, डाइबिटीज़, गोचर्स  डिजीज, एचआईवी/एड्स,सिस्टेमेटिक लुप्स एरिथेमाटोसस और सिकल सेल, सेल एनिमिया जैसी बीमारियां होने पर भी एवैस्कुलर नेक्रोसिस होने का खतरा रहता है। हड्डीयों का चिकनापन भी खत्म होने लगता है। ऐसे में रुमेटोलॉजिस्ट या ऑर्थोंपेडिक सर्जन से दिखाना चाहिए। 

जांच-पड़ताल : आपके जोड़ों कि जांच-परख करने के बाद डॉक्टर इमेजिंग टेस्ट की सलाह देते हैं। इस टेस्ट मे जोड़ों का एक्स-रे, एमआरआई व सीटी स्कैन और बोन स्कैनिंग की जाती है। हालांकि शुरुआती दौर में एक्स-रे रिपोर्ट सामान्य ही आती है। एमआरआई और सीटी स्कैन हड्डीयों की विस्तृत इमेज सामने रखते हैं, जिससे डॉक्टर को इसमें होने वाले शुरुआती बदलाव का पाता चल पाता है। 

मेडिकेशन व थेरेपी : एवैस्कुलर नेक्रोसिस के शुरुआती दौर में इसके लक्षणों को समाप्त करने के लिए दवाइयां और थैरेपी का सहारा लिया जाता है। इसके तहत मरीजों को दर्द कम करने, रक्त नलिका के अवरोध को दूर करने की दवाइयां दी जाती हैं। मरीज की क्षतिग्रस्त हड्डीयों पर पड़ने वाले भार व दबाव को कम करने की कोशिश की जाती है। इसके अलावा, हड्डीयों को मजबूती प्रदान करने के लिए एलेंड्रोनेट थैरेपी का सहारा लिया जाता है, ताकि उसे खत्म होने से बचाया जा सके। अगर इलाज के दौरान एलेंड्रोनेट, एक तरह का बाइस्फॉस्फ़ोनेट की टैबलेट ली जाए, तो मरीज इस बीमारी से छुटकारा पा सकता है। 

एलेंड्रोनेट का इस्तेमाल ऑस्टियोपोरोसिस के इलाज के लिए किया जाता है। इससे हड्डियों का घिसना रुक जाता है। इस दवा के सेवन से कुछ ही सप्ताह में दर्द से आराम मिल जाता है। इस दवा को सुबह खाली पेट एक या दो ग्लास पानी के साथ लिया जाता है। 

इस टैबलेट से उन मरीजों को भी दर्द से राहत मिल जाती है, जिन्हें सर्जरी की जरूरत होती है। यह दवा कैल्शियम और विटामिन डी की अनुपस्थिति में काम नहीं करती है। इसलिए तीन साल तक कैलिशयम और विटामिन डी के सप्लीमेंट लेते रहते चाहिए। इस बीमारी के बहुत ज्यादा गंभीर होने पर सर्जरी करते हैं। सर्जरी के तहत हड्डीयों के क्षतिग्रस्त भाग की जगह मरीज के शरीर की कोई और हड्डी को लेकर लगाई जाती है।

डॉ॰ संजय अगरवाला 
हेड, ओथ्रोंपेडिक्स एंड ट्रोंमालोजी 
पी॰डी॰हिंदुजा नेशनल अस्पताल, मुम्बई