Sunday, 18 October 2015

What is cervical spondylosis treatment - In Hindi

Cervical Spondylosis: Causes, Symptoms, & Treatment
In Hindi - सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस -स्पॉन्डिलाइटिस क्या है

आधुनिक जीवनशैली में कुछ बीमारियां ऐसी हैं जो लंबे समय तक एक जैसे बैठने के कारण होती हैं। इनमें कमर एवं गर्दन का दर्द प्रमुख है। इसका मुख्य कारण होता है ‘स्पॉन्डिलाइटिस सर्वाइकल'| स्पॉन्डिलाइटिस से गर्दन और रीढ़ की हड्डी ज्यादा प्रभावित होती हैं। इसकी समस्या 10 से 7 लोगों में दिखती है।

‘स्पॉन्डिलाइटिस’ क्या है? 

ये रिढ़ की हड्डी से संबन्धित रोग है। इस रोग में रिढ़ की हड्डी में सूजन आ जाती है। दो स्पॉन्डिलाइटिस यूनानी शब्द ‘स्पॉन्डिल’ तथा ‘आइटिस’ से मिलकर बना है स्पॉन्डिल का अर्थ है कशेरुका ‘वर्टिब्रा’ तथा आइटिस का अर्थ सूजन होता है अर्थात कशेरुका या वर्टिब्रा (रीढ़ की हड्डी) में सूजन की शिकायत को ही स्पॉन्डिलाइटिस कहा जाता है। इसमें पीड़ित को गर्दन को दाएं-बाएं और ऊपर-नीचे करने में काफी दर्द होता है। यह केवल सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस की बात की जा रही है।

कारण :  इस बीमारी का सबसे बड़ा कारण बढ़ती उम्र और खराब जीवनशैली है। घंटों एक ही स्थिति में लंबे समय तक काम करने से गर्दन या कमर प्रभावित होती है। नियमित रूप से व्यायाम नहीं कर पाना भी एक और कारण है। इससे गर्दन की हड्डी पर दबाव बढ़ता है। फलत: समूचे शरीर पर नियंत्रण रखने वाली रक्त कोशिकाएं क्षतिग्रस्त हो सकती हैं और जोड़ खराब हो सकता है इसके कारण स्पाइनल कॉर्ड (मेरूरुज्जा) पर दबाव पड़ता है। उस पर हल्का झटका लगने से लकवा हो सकता है। सिर झुकाकर काम करने वालों के इस रोग से ग्रसित होने की आशंका अधिक होती है। जो लगातार कम्प्यूटर पर काम करते हैं, उनके सवाईकल स्पोंडीलाइटिस की आशंका अधिक होती है। जो लोग भारी बोझ उठाने और उतारने का काम करते हैं, उनके भी कंधे व कमर में स्पोंडीलाइटिस की आशंका बढ़ जाती है। 

लक्षण: इससे पीड़ित व्यक्ति को पीठ दर्द के साथ कंधे और गर्दन में वेदना, कोई काम करने में पीड़ा, कोई चीज उठाते समय दर्द, हाथ पैर में झुनझुनी, सिर में भारीपन या चक्कर आना, लेटकर तुरंत उठते वक्त चक्कर आनया नशा-सा महसूस होना इत्यादि लक्षण दिखाई देते हैं। कुछ लोगों को सिरदर्द, चुभन या सुन्न होने की शिकायत हो सकती है। स्पोंडीलाइटिस से आमतौर पर 30-50 साल के आयु वर्ग के लोग अधिक पीड़ित होते हैं। रीढ़ की हड्डी में अकड़न पैदा हो जाती है। इसके इलाज में देरी या लापरवाही नहीं करनी चाहिए। इलाज में देरी या लापरवाही से शरीर को नुकसान होता है। इसके बने रहने पर यह शरीर के अन्य प्रमुख जोड़ों को भी प्रभावित करता है। 

रोकथाम: समान्यत: गर्दन और कमर के स्पोंडीलाइटिस को शुरू में व्यायाम, दर्द निवारक दवाएं, बेल्ट बांधने इत्यादि से ठीक किया जा सकता है। बीमारी बढ्ने पर जांच करानी चाहिए और कुछ को ऑपरेशन कराना भी आवश्यक हो जाता है। खासकर उन लोगों को जिन्हें नसों या स्पाइनल कार्ड पर दबाव पड़ने की वजह से कई तरह की समस्याएं हो जाती हैं, लेकिन इस बीमारी से ग्रसित होने की आशंका वाले लोग थोड़ा सजग होकर इस रोग से बचाव कर सकते हैं। चिकित्सक से पूछकर कुछ विशेष प्रकार का व्यायाम करके इस रोग को नियंत्रित रखा जा सकता है। 
जब आराम न मिले और स्पोंडिलाइटिस के कारण आस-पास की नसों में दर्द या सूजन फ़ेल जाने की स्थिति में स्पाइन विशेषज्ञ से सलाह लेना आवश्यक होता है। स्पाइन विशेषज्ञ ही जांच के बाद बता सकता है कि नसों में दर्द या सूजन स्नायु रोग के कारण है या नहीं। गर्दन आपको आराम देने के लिए सर्वाइकल कॉलर पहननी चाहिए। 

बचाव व इलाज : सर्वाइकल स्पोंडिलाइटिस में प्रभावित स्थान पर गर्म पानी के बैग या बर्फ के टुकड़ों से सिकाई करना भी एक अच्छा विकल्प है। इससे जल्दी ही राहत मिलती है, लेकिन यह लगातार करना होता है। सर्जरी की सलाह तब ही दी जाती है जब यह समस्या मस्तिष्क की नसों तक क्षति पहुंचाने लगे और प्राथमिक उपचारों से आराम न मिले। इसमें इंटीरियर सर्वाइकल डिस्केटोमी एंड फ्यूजन नाम की सर्जरी की जाती है। इसमें प्रभावित डिस्क को हटाकर बोन ग्राफ्ट लगाया जाता है, जिसमें हिप के आस-पास से बोन का छोटा हिस्सा निकालकर, हटाई गई डिस्क की जगह लगा दिया जाता है। जिन लोगों में एक से अधिक नसें प्रभावित होती हैं उनमें सर्वाइकल लेमिनेक्टोमी की प्रक्रिया अपनाई जाती है। इस तरह की सर्जरी में कुल 60 से 80 हजार रुपए तक खर्च आता है। 

फ़ैक्ट : सर्वाइकल के अलावा रुमेटाइड और एंकीलोजिंग स्पोंडिलाइटिस भी होते हैं। इसमें एंकीलोजिंग सबसे ज्यादा गंभीर माना जाता है। 


ए.बी. गोरेगांवकर


प्रोफेसर और हेड ऑफ आर्थोपेडिक्स, एलटीएम मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल, सायन, मुंबई

Kidney Disease Causes and Basic Information किडनी से संबंधित समस्याएं

किडनी से संबंधित समस्याएं
Types of kidney disease-what is kidney and its function
Kidney Disease Causes and Basic Information


आज भारत देश मे लगभग 5 लाख ऐसे मरीज हैं, जिनकी किडनी पूरी तरह खराब हो चुकी है। हर साल एक लाख नए मरीज बढ़ जाते हैं। देश के प्रत्येक 2000 परिवार में से एक परिवार इस बिमारी से ग्रसित है। केवल 2 प्रतिशत लोगों को ही उचित उपचार मिल पता है। 

क्या है किडनी एवं इसका कार्य  - 

किडनी  व्यर्थ पदार्थों और तरल पदार्थों की अत्यधिक मात्रा को शरीर से बाहर निकालकर रक्त को साफ करती हैं। रक्त में सॉल्ट और धातुओं की मात्रा को संतुलित रखती हैं। ये ही ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करने में सहायता करती हैं। ये शरीर में पानी की मात्रा को संतुलित करती हैं। एक किडनी 2 इंच चौड़ी, 1.5 इंच मोटी और 4 इंच लंबी होती है। किडनी लाखों छलनियों तथा लगभग 140 मील लम्बी नलिकाओं से बनी होती है। किडनी की इन इकाइयों को नैफ्रॉन कहते है। एक किडनी में लगभग 10 लाख ऐसी इकाई होती है, जो माइक्रोस्कोप से देखी जा सकती है। नलिकाएं छने हुए द्रव में से शरीर के लिए उपयोगी सोडियम, पोटेशियम, कैल्शियम इत्यादि को दोबारा सोख लेती हैं। हर दिन औसत 1.5 लीटर यूरिन के रूप में बाहर निकाल देती है। 

किडनी से संबंधित समस्याएं -

क्रॉनिक किडनी डिसीज (सीकेडी): सीकेडी को एस्टाब्लिशड रीनल फेलियर (ईआरएफ) या एंड स्टेज किडनी डिसीज कहते हैं। इसमें किडनी की कार्यक्षमता धीरे-धीरे कम होती जाती है। किडनी सामान्य कार्य नहीँ कर पाती है और क्षमता कम हो जाती है। सीकेडी से पीड़ित आधे लोग अस्पताल तब जाते हैं जब उनकी किडनी आधा ही कम कर पाती है। पहले और दूसरे चरण में ही रोग का पता लग जाए तो दवाओं से रोग बढने से रोका जा सकता है।

किडनी में सूजन : इसमें किडनी की फिल्टरिंग इकाइयों में सूजन आ जाती है। वे क्षतिग्रस्त हो जाती है। ये डिसऑर्डर तीसरा सबसे आम है। इसे ग्लोमेरूलोनेफ्रीटाइटिस कहते हैं।

पॉलीसिस्टिक किडनी डिसीज :  यह एक अनुवांशिक रोग है, इसमें किडनी में सिस्ट बन जाते हैं।
किडनी में इंफेक्शन : इसमें संक्रमण को पायलोनेफ्रिटिस भी कहते हैं। यह संक्रमण किडनी स्टोन के कारण हो सकता है। इससे मूत्र के किडनी से बाहर की ओर प्रवाह में रुकावट आती है और मूत्र वापस किडनी में आ जाता है। इससे किडनी में संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। वैसे किडनी और मूत्र मार्ग के 80 प्रतिशत संक्रमण ई कोलाइ और अन्य बैक्टीरिया के कारण होते हैं। ई कोलाई संक्रमण दूषित आहार व जल से होता है।

किडनी फेल : गंभीर रोग में किडनी फेल हो सकती है। इसमें किडनी सामान्य गतिविधियों का 15 प्रतिशत से भी कम काम कर पाती है। इसे एंड स्टेज रीनल डिसीज (ईएसआरडी) कहते हैं। 

कारण : किडनी खराबी के यूं तो बहुत सारे कारण हैं लेकिन मुख्य कारण निम्न हैं-

डायबिटीज़, हाई ब्लड प्रेशर, किडनी में पथरी, किडनी रोगों का पारिवारिक इतिहास, मोटापा, कोलेस्ट्रॉल बढना, प्रोस्टेट की बीमारियां। पेनकीलर और दूसरी कई दवाओं का अधिक प्रयोग। रजत भस्म और स्वर्णभस्म युक्त आदि दवाएं प्रयोग में लेने से।

लक्षण : इसमें शरीर में सूजन का आना, भूख की कमी, उल्टी आना, खून की कमी, हड्डियां कमजोर, थकान लगना। सांस फूलना, ब्लड प्रेशर बढ़ जाना, मूत्र की मात्रा में कमी होना, मूत्र मे रक्त आना।

इलाज यें हैं-

डायलिसिस : यह प्रक्रिया है जो स्वस्थ किडनी के समान कार्य करती है। इससे शरीर से अतिरिक्त तरल व्यर्थ पदार्थों को निकाल कर इलेक्ट्रोलाइट का संतुलन रखा जाता है।

हीमोडायलिसिस : इसमें कृत्रिम किडनी/ फिल्टर द्वारा मशीन से रक्त साफ किया जाता है। इसमें दो सुइयां इस्तेमाल होती हैं। एक सुई से गंदा खून मशीन व कृत्रिम गुर्दे में जाता है दूसरी सुईं से साफ खून वापिस शरीर में लौटता है। एक व्यक्ति को औसतन प्रति सप्ताह दो से तीन बार हीमोडायलिसिस करवाना होता है।

डॉ रमेश जैन - एचओडी, किडनी ट्रांसप्लांटेशन सेंटर, सरोज सुपर स्पेशलिटी अस्पताल, नई दिल्ली

Healthy Home Made Soup - पौष्टिकता से भरपूर घर का बना सूप

Healthy Home Made Soup - पौष्टिकता से भरपूर घर का बना सूप
healthy homemade soup benefits

बाजार में बिकने वाले रेडीमेड इंसटेंट सूप लोग पसंद करते हैं। लेकिन घर पर बनने वाले सूप की बात ही कुछ और है। आइए जानते हैं घर पर बने विभिन्न प्रकार के सूप के फायदों के बारे में।

मिक्स वेजिटेबिल: पालक, पुदीना, चुकंदर, लौकी, टमाटर, आंवला व अदरक से बने मिक्स वेजिटेबिल सूप में आयरन व फॉस्फोर्स के अलावा विटामिन-बी, सी व डी पाया जाता है। यह पीलिया, लीवर, कब्ज, भूख बढ़ाने व आंखों के लिए लाभकारी है। चर्मरोग और शरीर में सूजन होने पर इसे न लें। अगर हाई ब्लड प्रेशर की समस्या हो तो इसे बनाते वक्त नमक का प्रयोग न करें। 

लौकी : इसमें कार्बोहाइड्रेट, आयरन, विटामिन-बी व मिनरल्स पाए जाते हैं। हल्का होने के कारण यह पेट में भारीपन, भूख न लगना या लीवर संबंधी समस्या में लाभकारी है। इसके अलावा यह पित्तनाशक व खून बढ़ाने वाला होता है। इसे किसी भी व्यक्ति को दिया जा सकता है। 

पिंड-आंवला : पिंड खजूर व आंवला से बने सूप में प्रचुर मात्र में आइरन, मिनरल्स व विटामिन-सी और डी पाए जाते हैं। यह शारीरिक कमजोरी, ह्रदय संबंधी रोग व आंखों की कमजोरी को दूर करने में सहायक हैं। दस्त या बदहजमी होने पर इसे न लें। 

सही तरीका : सूप को हमेशा भोजन के पहले लेना चाहिए। लेकिन अगर आप सुबह के समय इसे ले रहे हैं तो नाश्ते के बाद पिएं। खाली पेट सूप सेहत के लिए नुकसानदायक हो सकता है। इसे लेने के पहले या बाद में एक घंटे तक दूध या चाय न पिएं। इससे पेट में एसिडिटी या किसी अन्य प्रकार की दिक्कत होने की आशंका रहती है।

ध्यान रखे : जहां तक संभव हो सूप को हमेशा ताजा बनाकर पिएं। एक दिन से ज्यादा रखा हुआ सूप न पिएं क्योंकि इसमें बैक्टीरिया उत्पन्न होने का खतरा रहता है। हमेशा गर्म सूप पिएं और इसे बनाते समय मक्खन, घी, तेल या किसी अन्य चिकने पदार्थ का प्रयोग न करें वर्ना वसा की अधिक मात्रा मोटापा बढ़ा सकती है।

वैध पदम जैन, आयुर्वेद, विशेषज्ञ

Rain and Eye Conjunctivitis in Hindi

Rain and Eye Conjunctivitis - In Hindi
बारिश में रखें आंखों का खयाल - कंजंक्टिवाइटिस


मानसून के दौरान आंखों में कुछ विशेष प्रकार के रोंगों की आशंका बढ़ जाती है जिसमें कंजंक्टिवाइटिस मुख्य हैं। इस रोग में आंखों में लालिमा, खुजली, जलन, आंखें चिपकना व धुंधला दिखाई देना जैसे लक्षण हो सकते हैं जानते हैं इस रोग से बजाव के बारे में।

एलर्जिक कंजंक्टिवाइटिस : इस रोग में पीड़ित व्यक्ति की आंखों में तेज खुजली, लालिमा, सूजन, जलन व भारीपन जैसे लक्षण हो सकते हैं।

बैक्टीरियल कंजंक्टिवाइटिस : आंखों में चुभन, लालिमा, व पानी आना जैसे लक्षण इस रोग में होने लगते है। पीड़ित व्यक्ति को इस दौरान अपना तौलिया/ रुमाल/ कपड़े आदि अलग रखने चाहिए ताकि संक्रमण दूसरे व्यक्तियों में ना फैले।

वायरल कंजंक्टिवाइटिस : इससे आंखों में लालिमा व धुंधला दिखाई देने जैसे लक्षण हो सकते हैं। यह वायरल आई फ्लू एडीनोवायरस (टाईप 8 व 19) से हो सकता है। इससे कभी-कभी कानों के पास कनपटी पर सूजन भी हो सकती है और कॉर्निया में सूक्ष्म जख्म होने से दिखना भी कम हो जाता है। यह एक या दोनों आंखों को प्रभावित करता हैं। इस समस्या के इलाज में देरी से धुंधलापन हमेशा के लिए भी हो सकता है।

कैमिकल कंजंक्टिवाइटिस : स्वीमिंग पूल में नहाने के बाद आंखों में खुजली, जलन या किरकिरी लगना आदि लक्षण हो सकते हैं।

सावधानी बरतें -

आंखों को रोजाना ठंडे पानी से 3-4 बार धोलें। मानसून में आंखों में सुखपन होता है इसलिए इन्हे रगड़े या मसलने नहीं।
अपना तौलिया या रुमाल आदि किसी के साथ शेयर न करें।
नियमित रूप से हाथों को धोएं। गंदे हाथों से आंखों को छूने से बचें वर्ना संक्रमण का खतरा रहता है।
मानसून के दिनों में आई मेकअप से परहेज करें। आंखों का कोई रोग होने पर विशेषज्ञ की सलाह के बाद ही आई ड्रॉप आदि का प्रयोग करें।

डॉ. सुरेश कुमार पाण्डेय, नेत्र सर्जन

bmi and cancer risk in Hindi

BMI and Cancer Risk in Hindi
बीएमआई संतुलित होने से टल सकता है कैंसर का खतरा


34 वर्षीय वरुण पेशे से बैंकर है। अक्सर 9 घंटे से ज्यादा वक्त तक कुर्सी से जुड़े रहने के कारण उन्हे शरीर के दाएं तरफ भारीपन महसूस होने लगा था। वे जंक फूड ज्यादा खाते हैं। स्मोकिंग और ऑफिस खत्म होने के बाद दोस्तों के साथ शराब भी पीते हैं। उन्हे छाती में दर्द महसूस होने लगा। शुरुआत में लगा कि शायद मसलपुल या थकान के कारण ऐसा हो रहा है। अचानक एक दिन दिल का दौरा पड़ गया। समय पर डायग्नॉज और इलाज होने के कारण वरुण अब ठीक है। डॉक्टर ने ब्लॉक्ड आर्टरीज़ खोलने के लिए न्यू एज ड्रग स्टेंट डाला है। इन दिनों वरुण वजन कम करने में लगें हुए हैं

यह सारी परेशानी मोटापे के कारण हुई है। भारत में मोटापे कि समस्या तेजी से बढ़ रही है। हाल ही में हुए एक सर्वे के अनुसार पिछले पांच वर्षों में (13-15 वर्ष) युवाओं में मोटापा 16 फीसदी से बढ़कर 29 फीसदी तक पहुंच चुका है। डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट के मुताबिक जिन लोंगों का बीएमआई 30 या 30 से अधिक है, वे मोटापे से ग्रस्त हैं। जिनका बीएमआई 25 से 29.9 के बीच है, उन्हे ज्यादा वजन की श्रेणी में रखा गया है। जिन लोगों का बीएमआई 18.5 से कम है, वे अंडरवेट यानी जितना वजन होना चाहिए उस से कम है। जिन लोगों का बीएमआई 18.5 से 24.9 के बीच है, वे स्वस्थ हैं। हृदय रोग और उससे होने वाली मृत्यु का सबसे अहम कारण मोटापा है। पेट के इर्द-गिर्द फैट इकट्ठा होने से मेटाबॉलिज़्म पूरी तरह से प्रभावित होता है। ब्लड लिपिड लेवल, ब्लड प्रेशर और इंसुलिन को एब्जॉर्ब करने का नेचुरल प्रोसेस गड़बड़ा जाता है। सही तरीके से इंसुलिन एब्जॉर्ब न करने के कारण डायबिटीज़ और हार्ट डिसीज की संभावना बढ़ जाती है। टाइप-2 डायबिटीज़ से पीड़ित ज़्यादातर लोगों का वजन ज्यादा होता है। हाई बीएमआई के कारण कोरोनरी हार्ट डिसीज का रिस्क दोगुना हो जाता है।

मैनेजमेंट और इलाज : हेल्दी लाफस्टाइल से एनर्जी की कमी नहीं रहती इसके अलावा कई दूसरे फायदे भी होते हैं, जैसे- जोड़ों और मांसपेशियों में दर्द कम हो जाता है। ब्लड प्रेशर संतुलित रहता है। सर्कुलेशन सिस्टम मजबूत बनता है। अच्छी तरह से नींद आती है। कई किस्म के कैंसर और हृदय रोग को खुद दूर रखा जा सकता है।


डॉ. बीबी छनाना
हेड, कार्डीयोलोजी 
डिपार्टमेन्ट, महाराजा अग्रसेन
हॉस्पिटल, नई दिल्ली

How to get artificial dimples surgery - In Hindi

What is Artificial Dimples and how do we get this
How to get artificial dimples with surgery - In Hindi
ऐसे पाइए गालों पर आर्टिफिशियल डिंपल 

अभिनेत्री प्रीति जिंटा के गालों में डिंपल्स के बाद इस फेहरिस्त में दीपिका पादुकोण और आलिया भट्ट का नाम भी जुड़ चुका है। डिंपल्स वैसे तो नैचुरल हैं, लेकिन इन दिनों एक छोटी सी सर्जरी से भी डिम्पल बनवाए जा सकते हैं। चेहरे पर आर्टिफिशियल डिंपल को इम्प्लांट करने का एक तरीका है। इसमें एक छोटा सा टांका गालों के अंदर की तरफ लगाया जाता है, जहां आप डिंपल बनाना चाहते हैं वहां। जब टांका त्वचा के अंदरूनी हिस्सों में बांधा जाता है, तब एक गड्ढेनुमा आकार त्वचा में बनाना शुरू हो जाता है। खास बात यह कि सर्जरी या आर्टीफ़िशियल डिंपल बनाने कि प्रक्रिया से चहरे पर किसी तरह का कोई दाग या निशान नहीं पड़ता है। यह प्रक्रिया पूरी तरह से दर्द रहित होती है। सर्जरी के थोड़े समय के बाद मुस्कुराने या हंसने पर ही डिंपल नजर आने लग जाता है और अंदरूनी त्वचा और मांसपेशियों के ठीक बीच एक स्थायी डिंपल का निर्माण हो जाता है।
हर तरह के चेहरे और त्वचा के लिए सटीक: डिंपल क्रिएशन सर्जरी हर तरह के चेहरे और तवचा पर आसानी से कि जा सकती है। देशभर में कई कॉस्मेटिक सर्जरी क्लीनिक खुल गए हैं। जो इस तरह की सर्जरी करते हैं, लेकिन किसी भी तरह का कॉस्मेटिक ट्रीटमेंट लेने से पहले यह जरूरी है कि आप खुद कि तसल्ली जरूर करिए। यह जानना बहुत जरूरी है कि जंहा आप सर्जरी करवाने जा रहे हैं वह पूरी तरह से सुरक्षित है। यह प्रक्रिया प्रशिक्षित डॉक्टरों कि टीम द्वारा की जा रही है या नहीं, क्योंकि थोड़ी-सी लापरवाही आपके चहरे कॉ संवारने के बजाय बिगाड़ सकती है।

डॉ. सीमा मालिक 
डर्मेटोलॉजिस्ट, नई दिल्ली 

What is Urinary incontinence cause treatment In Hindi

What is Urinary Incontinence Treatment Causes Hindi 

In Hindi यूरिनरी इंकॉन्टिनेंस की समस्या और इलाज 


यूरिनरी इंकॉन्टिनेंस एक ऐसी बीमारी है, जो महिला को शारीरिक, मानसिक और सामाजिक तौर पर प्रभावित करती है। इसमें यूरिन के निकलने पर शरीर का नियंत्रण नहीं रह जाता|  इसे इंकॉन्टिनेंस नाम दिया गया है। यह बेहद मुश्किल भरा हो सकता है। यह हर आयु की महिलाओं को प्रभावित कर सकती है। इसकी आशंका गर्भवती या 18 से 40 आयु वर्ग की महिलाओं में ज्यादा होती है।

बीमारी की बड़ी तादात के बावजूद इसको लेकर लोंगों में जागरूकता नहीं है। इसकी बढ़ी वजह महिलाओं का इस बीमारी की अनदेखी कर डॉक्टर्स की मदद नहीं लेना है। इसमें हंसने, खासनें या छिकनें के दौरान लीकेज होता है। इसकी वजह ब्लैडर मसल्स की ओवर एक्टिविटी होती है। पेल्विक फ्लोर की कमजोरी की वजह से इसे स्ट्रेस यूरिनरी इंकॉन्टिनेंस भी कहा जाता है। 

इसलिए होती है- ब्लैडर मसल्स की ओवर एक्टिविटी की कई वजह हैं। जैसे कम पानी पीना, कॉफी, चाय या फ़िजी ड्रिंक्स का अत्यधिक सेवन, यूरिनरी स्टोन या ब्लैडर में अर्ली कैंसर। ब्लैडर कैंसर की वजह एक्टिव और पेसिव स्मोकिंग भी है।

यह है इलाज- इसके लिए कई तरह के ट्रीटमेंट उपलब्ध हैं। ब्लैडर ड्रिल (ब्लैडर मसल्स की एक्सरसाइज) फिजियोथेरेपी के साथ काफी मददगार है। इसके लिए ओरल मेडिसिन भी दी जाती है, जिन्हे इससे फायदा नहीं होता उन्हे ब्लैडर मसल्स में बोटोक्स के इंजेक्शन भी दिए जाते हैं। इससे करीब एक साल तक आराम रहता है। यह प्रक्रिया कम समय में पूरी हो जाती है। इसके लिए अस्पताल में रात रुकने की भी जरूरत नहीं होती है।

पेल्विक फ्लोर की कमजोरी की वजह से यह बीमारी बच्चे को जन्म देते वक्त, मुश्किल डिलीवरी या मेनोपॉज की वजह से भी होती है। कम उम्र में हिस्टेरेक्टॉमी (यूटेरस निकलवाना) भी इसकी वजह बनती है। कई बार यह परेशानी आनुवांशिक भी होती है। पेल्विक फ्लोर की स्ट्रेनथनिंग की एक्सरसाइज़ इसके लिए फायदेमंद है। बीमारी की गंभीरता के मुताबिक इसमें सर्जरी की जरूरत भी पड़ती है। यह छोटी सी प्रक्रिया 5 में से 4 महिलाओं में सफल रहती है। फिर दोबारा अस्पताल में भर्ती नहीं होना पड़ता है।       


डॉ॰ मीरा राघवन
कंसल्टेंट ऑब्स्टेट्रीशियन, अपोलो हॉस्पिटल 

Wednesday, 14 October 2015

Understand Heart Transplant Surgery in hindi हार्ट ट्रांसप्लांट

Understand Heart Transplant Surgery in hindi
Tips for heart Transplant in Hindi 
हार्ट ट्रांसप्लांट


एक बुझता हुआ चिराग कई चिराग रोशन कर सकता है। जयपुर में हुआ पहला हार्ट ट्रांसप्लांट भी इसका उदाहरण है। ब्रेन डेथ के बाद डोनर का हार्ट सिर्फ चार घंटे में पेशेंट में ट्रांसप्लांट करना होता है। इसके लिए हार्ट को एजटीके सॉल्यूशन में डालकर ठंडा करके प्रिजर्व किया जाता है। प्रिजर्व के दौरान हार्ट में ब्लड नहीं होता। इसी दौरान हार्ट ट्रांसप्लांट की तैयारीयां जारी रहती हैं। पेशेंट यानी रिसिपिएंट का हार्ट खराब होने की वजह से साइज बड़ा हो जाता है। इस हार्ट को निकालने में एक से डेढ़ घंटे का समय लगता है। प्रिजर्व किए गए हार्ट को लगाने से पहले उसकी पूरी हवा निकाल दी जाती है। पांच सूचर लाइनों को मद्देनज़र रखते हुए हार्ट को पिछले भाग से जोड़ते हुए आखिर में अयोट यानी बड़ी धमनी से जोड़ा जाता है। फिर हार्ट फंक्शन करना शुरू कर देता है।

ट्रांसप्लांट के लिए बॉडी साइज मैच करना जरूरी-

हार्ट ट्रांसप्लांट में डोनर और पेशेंट का बॉडी साइज मैच करना जरूरी है। दोनों के बॉडी साइज में तीस परसेंट से कम का अंतर होना चाहिए। यानी रिसिपिएंट का वजन 50 किलो है तो डोनर का वजन 65 किलो होना चाहिए। बॉडी साइज या वजन में तीस परसेंट से कम का अंतर होने पर एडल्ट में बच्चे का हार्ट भी ट्रांसप्लांट हो सकता है। ट्रांसप्लांट के लिए लंग्स का हेल्दी और मजबूत होना जरूरी है। 

ट्रांसप्लांट के लिए 60 साल तक की उम्र -

पश्चिमी देशों में ट्रांसप्लांट के लिए रिसिपिएंट की उम्र 65 साल होनी चाहिए। लेकिन इंडिया में उम्र 60 साल है। हार्ट फेलियर के जिन पेशेंट्स में एक साल से कम लाइफ एक्सपेक्टेंसी है, उनमे ही ट्रांसप्लांट किया जाता हैं।

किन पेशेंट्स में होता है ट्रांसप्लांट-

हार्ट अटैक से मसल्स कमजोर होने, वाल्व खराब होने, वायरल इंफेक्शन की वजह से हार्ट खराब होने पर ट्रांप्लांट होता है। दवाइयों से भी जिन हार्ट फेलियर केसेज में रिलीफ़ नहीं मिल पाता। उन पेशेंट्स में ट्रांसप्लांट होता है।

आइडेंटिकल टिवंस के हार्ट में रिजेक्शन नहीं-

ट्रांसप्लांट के लिए आइडेंटिकल टिवंस का हार्ट या दूसरे ऑर्गेन बेहतर होता है। इनमें जीन एक समान होने की वझ से ऑर्गेन रिजेक्शन की संभावना नहीं रहती, जबकि बाकी रिसिपिएंट्स में ट्रांसप्लांट के बाद करीब एक साल तक में एंटी रिजेक्शन इंजेक्शन देने जरूरी होते हैं।

ट्रांसप्लांट पर आने वाला खर्च अभी तय नहीं-

हार्ट ट्रांसप्लांट में आने वाला खर्च अभी तय नहीं हुआ है। चेन्नई और अन्य सेंटरों पर करीब दस से पंद्रह लाख का खर्चा आता है। हालांकि, चेन्नई गवर्नमेंट की और से ट्रांसप्लांट के बाद एंटी रिजेक्शन दवाइयां फ्री दी जाती हैं। इंडिया में हार्ट फेलियर केसों में मैकेनिकल हार्ट डिवाइस और आर्टिफ़िशियल हार्ट सफल नहीं है। क्योंकि मंहगे होने के अलावा इनसे जुड़े कॉम्पलिकेशन बहुत ज्यादा है। वंही, इसकी तुलना में ट्रांसप्लांट सस्ता है। रिजल्ट भी बेहतर है।

डॉ. एम. ए. चिश्ती, हार्ट ट्रांसप्लांट एक्सपर्ट 

Tips For Healthy Eye Care in hindi

Tips For Healthy Eye Care in hindi
In Hindi Eye care tips and treatment 


अच्छे विजन के लिए माउस और रिमोट नहीं, बच्चों को दें खेल के मैदान

बच्चों में चश्में का नंबर डायग्नोस नहीं हो पाने के कारण उनकी आंखों की रोशनी कम हो रही है। सही समय पर विजन की स्क्रीनिंग नहीं होने के कारण उनके चश्मा के नंबर डायग्नोस नहीं हो पाता है। इससे उनका विजन इतना कम हो जाता है कि उन्हे दिखना बंद हो जाता है। करीब पचास परसेंट बच्चे इसी वजह से अंधे हो जाते हैं। क्योंकी बच्चे के ब्रेन का सबसे ज्यादा विकास एक साल की उम्र मे ही होता है। वही एडल्ट्स में स्मोकिंग के कारण भी रेटिना पर इतना बुरा असर पड़ता है की विजन प्रभावित होता है।

ब्रेन विकास के लिए जरूरी कैटरेक्ट का इलाज-

माँ को प्रेग्नेंसी में न्यूट्रीशियस डाइट नहीं मिलने से या रूबैला जैसे इंफेक्शन होने से बच्चों में पैदाइशी कैटरेक्ट देखा जा रहा है। बच्चों में सिर्फ सर्जरी ही इसका इलाज है। मॉडर्न टेक्निक से 20 दिन से छोटे बच्चे की आंखों की सर्जरी करके इसे ठीक किया जा सकता है। अगर कैटरेक्ट समय पर नहीं निकाला जाता तो उसके ब्रेन का विकास नहीं हो पाता। साथ ही प्री मैच्योर न्यू बोर्न बच्चे, जिन्हें ऑक्सीज़न थेरेपी पर रखा जाता है, उनकी आंखों के परदे की जांच बेहद जरूरी है। 


धूप नहीं मिलने से भी नजर कमजोर-

जिन पेरेंट्स को चश्मा लगा है, उनके बच्चों में कमजोर नजर होने की संभावना ज्यादा होती है। आंखों का आकार बढने के साथ-साथ चश्मे का नंबर बढ़ता है। इसके अलावा घर के अंदर रहने और धूप नहीं मिल पाने के कारण भी चश्मे का नंबर बढ़ रहा है। पास की चीजों को बिना चश्मे के पूरी ताकत से देखने की कोशिश की जाती है तो भी नंबर बढ़ता है। इसलिए प्री-स्कूल में और हर 6 महीने के अंतराल में आई साइट को चैक जरूर करवाना चाहिए। चश्मे का नंबर बढ़ने से आंखों में तिरछापन आ जाता है। साथ ही उनमें कुछ भेंगापन भी आने लगता है। चश्मा नियमित रूप से पहनने से कुछ तरह का भेंगापन खत्म हो जाता है। भेंगेपन को ऑपरेशन से भी ठीक किया जा सकता है। 


चश्मे का नंबर कैसे घटाएं

बच्चों में सही समय पर कमजोर नजर की जांच न होने पर, दिमाग के साइट सेंटर का विकास प्रभावित होता है। दो साल के बच्चों में आजकल माइनस दस या बारह नंबर तक चश्मा आम हो गया है। यह नंबर बहुत ज्यादा है। चश्मे का नंबर कम करने के लिए पूरा समय चश्मा लगाएं। हाल ही में हुई मेडिकल रिसर्च में सामने आया है कि जो बच्चे टीवी, लैपटॉप और मोबाइल कि स्क्रीन पर लगातार काम करते हैं, उनकी नजर तेजी से कमजोर होती है। इसलिए बच्चों को ज्यादा से ज्यादा आउटडोर एक्टिविटीज में बिजी रखें। स्क्रीन नहीं, खेलने के लिए मैदान और पार्क में भेजें।        

रोशनी बढ़ाने के लिए क्या दें बच्चों को : -

डेयरी प्रोडक्ट्स, अखरोट, अंजीर, बादाम, हरी सब्जी, अल्सी के बीज।

डॉ. समरेश श्रीवास्तव, ऑप्थेल्मोंलॉजिस्ट

What is flat foot causes and treatment in hindi

In Hindi -What is flat foot causes and treatment in hindi
फ्लैट फुट 

फ्लैट फुट की समस्या 10 में से 4 लोगों में देखने में आती है। यह तकलीफ महिलाओं में ज्यादा होती है, क्योंकि उनके जोड़ो में शिथिलता रहती है। लंबे समय तक उपचार न किए जाने पर यह समस्या भविष्य में पैरों के पंजे में आर्थराइटिस का कारण भी बन सकती है।

जन्म के समय प्राय: सभी बच्चों के पैर समतल होते हैं, लेकिन उम्र बढने के साथ उनका पॉश्चर बदलता है और वे चलना सीखते हैं। उनकी मांसपेशियां मजबूत होने लगती है और 9-10 साल की उम्र तक तलवो की आर्च यानी घुमाव विकसित होने लगता है। सामान्य रूप से पैर के तलवों में आर्च होने से शरीर का भार एड़ी और पंजों पर समान रूप में बंट जाता है। इसी कारण हम दौड़-भाग कर पाते हैं। फ्लैट फुट होने के कारण शरीर का पूरा भार पैरों पर पड़ता है, जिससे अधिक समय तक खड़ा रहने और चलने-फिरने में दिक्कत आती है। इनकी वजह से पिंडली की मांसपेशियों में दर्द होता है, जिससे पैरों की समस्या और अधिक गंभीर हो जाती है, यह तकलीफ 10 में से 4 लोगों में रहती है।

सपाट तलवे यानी फ्लैट फुट मुख्य तौर से दो प्रकार के होते हैं-

1. फ्लैक्सिबल 2. रीजिड
फ्लैक्सिबल फ्लैट फुट में सामान्य रूप से पैरों का आकार देखने में ठीक लगता है, पर दबाव डालने पर पैरों का संतुलन नहीं बन पाता और तलवे सपाट हो जाते हैं।
रीजिड फ्लैट फुट में तलवे का आकार समतल ही रहता है। चपटे तलवे की समस्या पूरी तरह तभी सामने आती है, जब बच्चे के चलने का समय शुरू होता है। जिन बच्चों में आर्च का सही विकास नहीं होता, उनमें अधिक चलने पर पैरों में दर्द या थकावट की शिकायत भी अधिक होती है। लंबे समय तक उपचार न किए जाने पर आगे चलकर यह पैरों में आर्थराइटिस का कारण भी बन सकती है। रीजिड फ्लैट फुट में दर्द के अधिक बढ जाने पर सर्जरी करवानी पड़ सकती है।

कारण : -
  • फ्लैट फुट होने का एक कारण जोड़ों में अत्यधिक शिथिलता होना है, जो अधिक वजन बढने से भी संबंधित होती है।
  • पैरों में एक खास नस होती है, जिसे टिबिया पोस्टेरियर कहते हैं। वह पैरों की आर्च को बनाए रखती है। यह अत्यधिक सूजन या पोटापे के कारण फट सकती है, जिसके कारण फ्लैट फुट की समस्या हो सकती है।
  • बचपन में पैरों की दो हड्डियां आसामान्य रूप से जुड़ जाती हैं, जिसे टॉर्सल कोएलिशन कहते हैं इससे पैर कड़े और चपटे हो जाते हैं।
  • फुट आर्थाराइटिस, जो पैर के पीछे या मध्य भाग में होता है, आमतौर पर पीड़ादायक होता है। यह चोट लागने या किसी अन्य कारण से भी हो सकता है।
  • कभी-कभी पैरों की कोई चोट या फ्रैक्चर भी चपटे तलवे का कारण बन जाते हैं। लिगामेंट्स के टूटने या कमजोर होने पर हड्डियां एक-दूसरे से जकड़े रहने की बजाय शिथिल हो जाती हैं, जिससे तलवा चपटा हो जाता है।
  • इनके अलावा मोटापा, पैरों या टखनो में चोट आना, रूमैटाइड आर्थराइटिस और उम्र का बढ़ना तथा डायबिटीज़ जैसे कारणों से भी फ्लैट फुट की समस्या हो जाती है।


लक्षण : 

अधिकतर लोगों में कोई लक्षण नहीं दिखाई देते हैं लेकिन इसकी शिकायत हो तो ये लक्षण दिखाई दे सकते हैं-

चलने में दर्द होना विशेष रूप से पैर और एड़ियों की अंदर की तरफ।
दौड़ते समय दर्द होना।
एड़ियों में अंदर की तरफ सूजन आना।
कभी-कभी पैर के तलवे या अंदर की तरफ झुनझुनी या सुन्नपन विकसित हो सकता है क्योंकि एड़ियों की तंत्रिकाएं या तो थोड़ी-सी खिंच जाती है।

डायग्नोसिस : एक्स-रे द्वारा फ्लैट फुट की पूरी जानकारी मिल जाती है। इसमें फ्लैट फुट के एक लक्षण आर्थराइटिस के बारे में भी पता चल जाता है। एमआरआई और सिटी स्कैन भी इसके बारे में जानकारी प्राप्त करने के लिए बहुत उपयोगी होते हैं।

उपचार : दर्द नहीं होता तो इसके लिए कोई उपचार आवश्यक नहीं है। अगर पैर फ्लैट लेकिन लचीला है, तब इसका उपचार सामान्य इन्सोल और फिजियोथेरैपी के द्वारा ठीक किया जा सकता है। आर्च (आर्थोटिक डिवाइसेस) से होने वाले दर्द में आराम मिलता है। जब दवाएं और खास जूते काम नहीं कर पाते हैं तो सर्जरी कराना आवश्यक होता है।

डॉ॰ प्रदीप मुणोत
आर्थपेडिक सर्जन, स्पेशलाइजिंग इन नी, फुट एंड ऐंकल सर्जरी, ब्रीच कैन्डी हॉस्पिटल ट्रस्ट, मुंबई