Tuesday, 5 January 2016

Avascular Necrosis Causes, Symptoms Treatment

जब हड्डियां घिसने लगे- Avascular Necrosis (Osteonecrosis) Causes, Symptoms Treatment in Hindi


Avascular Necrosis हड्डियों की एक ऐसी स्थिति है, जिसमें बोन टिश्यू यानी हड्डियों के ऊतक मरने लगते हैं। इस तरह की स्थिति तब उत्पन्न होती हैं, जब इन ऊतकों तक पर्याप्त मात्रा में रक्त नहीं पहुंच पाता है। इसे Osteonecrosis भी कहा जाता है। ऐसे लोग जो काफी लंबे समय से ज्यादा में मात्रा में steroids का इस्तेमाल करते हैं और ज्यादा शराब पीते हैं, उन्हें इस बीमारी के होने का खतरा ज्यादा रहता है। 


हड्डियां जब घिसने लगती हैं और खत्म होने के कगार पर पहुंच जाती हैं तो उसे Avascular Necrosis कहते हैं। हड्डी घिसने या जोड़ों के अलग होने के कारण उस हिस्से में रक्त आपूर्ति बाधित हो जाती है। यह किसी को भी हो सकती है, लेकिन 30 से 60 वर्ष की आयु वर्ग के लोगों को यह अपनी गिरफ्त में ज्यादा लेती है। 

लक्षण : कई लोगों में शुरुआती दौर में इस बीमारी के कोई भी लक्षण दिखाई नहीं देते हैं। जब स्थिति बहुत ज्यादा खराब हो जाती है, तब वजन उठाने पर जोड़ों में दर्द होने लगता है। और अंतत: स्थिति इतनी ज्यादा बिगड़ जाती है कि लेटे रहने पर भी जोड़ों में दर्द होता रहता है। इस बीमारी में मध्यम दर्जे का या बहुत तेज दर्द होता है और यह धीरे-धीरे बढ़ता जाता है। कूल्हे के एवैस्कुलर नेक्रोसिस होने पर पेडू, जांघ और नितंब में दर्द होता है। कूल्हे के अलावा इस बीमारी से कंधे, घुटने, हाथ और पैर के भी प्रभावित होने का खतरा बना रहता है। 

कारण : जोड़ों या हड्डियों में चोट लगना: जोड़ में किसी भी तरह का चोट या परेशानी जैसे जोड़ों के खुल जाने की वजह से उसके नजदीक की रक्त नलिकाएं क्षतिग्रस्त हो सकती हैं। 

रक्त नलिकाओं में फैट्स का जमाव : कई बार रक्त नलिकाओं में फैट्स का जमाव हो जाता है, जिससे ये नलिकाएँ संकरी हो जाती हैं। इससे हड्डियों तक रक्त नहीं पहुंच पाता है, जिससे उन्हें पर्याप्त पोषण नहीं मिल पाता है। सिकल सेल एनीमिया और गोचर्स डिजीज जैसी चिकित्सकीय स्थिति उत्पन्न होने पर भी हड्डियों तक पर्याप्त मात्रा में रक्त नहीं पहुंच पाता है। इन सबके अलावा कुछ ऐसे अनजाने कारण भी होते हैं, जिनकी वजह से यह बीमारी लोगों को अपनी गिरफ्त में ले लेती है। 

रिस्क फैक्टर : हड्डियों के घनत्व को बढ़ाने के लिए लंबे समय तक दवाएं लेने से केवल कैंसर मरीजों को जबड़ों के नेक्रोसिस होने का खतरा बढ़ जाता है। पैन्क्रिएटाइटिस, डाइबिटीज़, गोचर्स  डिजीज, एचआईवी/एड्स,सिस्टेमेटिक लुप्स एरिथेमाटोसस और सिकल सेल, सेल एनिमिया जैसी बीमारियां होने पर भी एवैस्कुलर नेक्रोसिस होने का खतरा रहता है। हड्डीयों का चिकनापन भी खत्म होने लगता है। ऐसे में रुमेटोलॉजिस्ट या ऑर्थोंपेडिक सर्जन से दिखाना चाहिए। 

जांच-पड़ताल : आपके जोड़ों कि जांच-परख करने के बाद डॉक्टर इमेजिंग टेस्ट की सलाह देते हैं। इस टेस्ट मे जोड़ों का एक्स-रे, एमआरआई व सीटी स्कैन और बोन स्कैनिंग की जाती है। हालांकि शुरुआती दौर में एक्स-रे रिपोर्ट सामान्य ही आती है। एमआरआई और सीटी स्कैन हड्डीयों की विस्तृत इमेज सामने रखते हैं, जिससे डॉक्टर को इसमें होने वाले शुरुआती बदलाव का पाता चल पाता है। 

मेडिकेशन व थेरेपी : एवैस्कुलर नेक्रोसिस के शुरुआती दौर में इसके लक्षणों को समाप्त करने के लिए दवाइयां और थैरेपी का सहारा लिया जाता है। इसके तहत मरीजों को दर्द कम करने, रक्त नलिका के अवरोध को दूर करने की दवाइयां दी जाती हैं। मरीज की क्षतिग्रस्त हड्डीयों पर पड़ने वाले भार व दबाव को कम करने की कोशिश की जाती है। इसके अलावा, हड्डीयों को मजबूती प्रदान करने के लिए एलेंड्रोनेट थैरेपी का सहारा लिया जाता है, ताकि उसे खत्म होने से बचाया जा सके। अगर इलाज के दौरान एलेंड्रोनेट, एक तरह का बाइस्फॉस्फ़ोनेट की टैबलेट ली जाए, तो मरीज इस बीमारी से छुटकारा पा सकता है। 

एलेंड्रोनेट का इस्तेमाल ऑस्टियोपोरोसिस के इलाज के लिए किया जाता है। इससे हड्डियों का घिसना रुक जाता है। इस दवा के सेवन से कुछ ही सप्ताह में दर्द से आराम मिल जाता है। इस दवा को सुबह खाली पेट एक या दो ग्लास पानी के साथ लिया जाता है। 

इस टैबलेट से उन मरीजों को भी दर्द से राहत मिल जाती है, जिन्हें सर्जरी की जरूरत होती है। यह दवा कैल्शियम और विटामिन डी की अनुपस्थिति में काम नहीं करती है। इसलिए तीन साल तक कैलिशयम और विटामिन डी के सप्लीमेंट लेते रहते चाहिए। इस बीमारी के बहुत ज्यादा गंभीर होने पर सर्जरी करते हैं। सर्जरी के तहत हड्डीयों के क्षतिग्रस्त भाग की जगह मरीज के शरीर की कोई और हड्डी को लेकर लगाई जाती है।

डॉ॰ संजय अगरवाला 
हेड, ओथ्रोंपेडिक्स एंड ट्रोंमालोजी 
पी॰डी॰हिंदुजा नेशनल अस्पताल, मुम्बई 

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