Tuesday, 8 September 2015

साइनस - Sinus Cause Symptoms and treatment in Hindi

What is Sinus Problem in hindi
Sinus Symptoms, cause and treatment 

साइनसाइटिस को आम बोलचाल में साइनस कहते हैं। यदि यह चार सप्ताह से अधिक समय रहता है तो एक्यूट और तीन माह से अधिक रहने पर क्रॉनिक हो जाता है। कई लोगों में इसके कारण दांतों में तकलीफ होती है। 15 फीसदी लोगों को यह पुरानी समस्या के रूप में रहती है - 

जानते हैं इसके बारे में-

साइनसाइटिस क्या है? यह एक प्रकार का जुकाम है जो साइनस के प्रभावित होने से होता है। साइनस हवा से भरी खोखली छोटी-छोटी गुहा रूपी सरंचनाएं हैं, जो नाक के आसपास चेहरे व सिर की हड्डियों के भीतर होते हैं तथा नाक के अंदर खुलते है। जैसे दोनों तरफ चेहरे की हड्डी में मैक्सीलेरी साइनस, नाक के ऊपर सिर में फ्रन्टल साइनस, आंख के पास एथमोइड साइनस तथा अंदरूनी भाग में बीचोबीच दिमाक से सटा स्फेनोइड साइनस। साइनसाइटिस, साइनस व आइटिस से मिलकर बना शब्द है, जिसका अर्थ है साइनस के अंदर सूजन आना। बहुधा इस समस्या में साइनस के साथ नाक भी प्रभावित होती है इसलिए इसके लिए राइनोंसाइनसाइटिस शब्द का प्रयोग भी किया जाता है। संबधित साइनस से नाक के अंदर खुलने वाला ऑस्ट्रियो छिद्र बंद हो जाता है। इसके अंदर बने म्यूकस के मार्ग में बाधा उत्पन्न होने से कई समस्याएं पनपने लगती हैं। 

सब से ज्यादा मैक्सीलरी साइनस, फिर एथमोइड साइनस, फिर फ्रन्टल व सबसे कम स्फेनोइड साइनस प्रभावित होते हैं। सभी साइनस एक साथ प्रभावित होने पर इस अवस्था को पेनसाइनसाइटिस कहा जाता है। यह सभी उम्र के लोगों को प्रभावित करने वाली एक आम समस्या है। हर साल प्रत्येक दस में तीन लोग इस बीमारी से पीड़ित हो जाते हैं। लगभग 15 फीसदी लोगों में साइनस समस्या पुरानी रहती है। 4 हफ्ते से कम समस्या रहने पर एक्यूट व 3 माह से अधिक रहने पर क्रॉनिक साइनसाइटिस कहलाती है।

कारण: - इस बीमारी के प्रमुख कारणों में नाक व साइनस में संक्रमण तथा एलर्जी बने रहना है। नाक में अंदर कई तकलीफें इसका कारण बन सकती हैं। जैसे हड्डी का टेढ़ापन। डेविएटेड नेजल सेप्टम, टरबीनेट्स का बढ़ना, ऐडेनोइड्रस टिश्यू बढ़ना, पॉलिप्स का बनना आदि। 20 प्रतिशत लोगों में मैक्सलरी साइनसाइटिस का कारण दांतों की तकलीफ होती है। बढ़ता प्रदूषण, गंदे पानी में स्वीमिंग करना भी इसकी वजह बन सकता है। लम्बे समय तक एलर्जी रहने पर साइनस के अन्दर की म्यूकोसा झिल्ली फूलकर रसोली (गठान का) जैसा आकार ले लेती है। इनको पॉलिप्स कहते हैं। वायरस, बैक्टीरिया के अलावा फंगस भी साइनस संक्रमण का कारण होते हैं।

लक्षण: - सिरदर्द, भारीपन व सबंधित साइनस की जगह पर दबाव महसूस होता है। साइनस का दर्द आगे झुकने पर प्राय: बढ़ जाता है। बुखार थकान, सूंघने की क्षमता में कमी, सांस में बदबू आना जैसे लक्षण हो सकते हैं। संक्रमित रिसाव के नाक के पीछे से गले में पोस्ट नेजल ड्रिप के रूप में टपकने से गला खराब रहता है। खांसी बनी रह सकती है। नाक से कान को जाने वाली यूस्टेशियन ट्यूब के प्रभावित होने पर कान में संक्रमण, भारीपन व सुनने में तकलीफ हो सकती हैं। इलाज न होने पर आंख व दिमाक की नजदीकी के कारण इन भागों के प्रभावित होने की आशंका रहती है। इससे ओरविटल सेल्यूलाइटिस, मेनिन्जाइटिस, केवरनस साइनस थ्रोंबोसिस जैसी जटिल स्थति हो सकती है।

जांच व उपचार: नेजल एंडोस्कोपी द्वारा नाक व साइनस को दूरबीन की सहायता से स्क्रीन पर देखा जाता है। सीटी स्कैन से सभी साइनस की वास्तविक स्थिति व अन्य महत्वपूर्ण संरचनाओं के बारे में जानकारी मिल जाती है। एंटीबायोटिक, एंटीएलर्जिक-एंटीकोल्क स्प्रे के प्रयोग से ज़्यादातर लोंगों में इस समस्या को ठीक किया जा सकता है। भांप का प्रयोग भी लाभकारी होता है। बार-बार लबे समय तक साइनस संकर्मण का कारण यदि हड्डी का टेढ़ापन, पॉलिप या बढ़े हुए एडोनोइडस हैं तो इन्हे ठीक करना भी जरूरी होता है। सर्जरी की आवश्यकता तब पड़ती है, जब दवा के बावजूद समस्या ठीक ना हो। इसे फंक्शनल एंडोस्कोपिक साइनस सर्जरी कहते हैं। इसमें बिना बाहरी चीर-फाड़ के दूरबीन की सहायता से नाक के अन्दर साइनसेज के ऑस्टिया को खोल दिया जाता है, जिससे म्यूकस का मार्ग सुचारु हो जाता है अन्य तकनीक बैलून साइनोप्लास्टी है, जिसमें पतले लचीले बैलून को फूलकर साइनस के छिद्र को चौड़ा किया जाता है।

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एलर्जी के अनुसार देश में साइनस के पीड़ितों की संख्या 13 करोड़ 40 लाख है, जो जापान से अधिक है।

डॉ. शुभकाम आर्य, सीनियर ईएनटी कन्सल्टेंट


Thursday, 3 September 2015

Deep Vein Thrombosis DVT Causes Symptoms Treatment Hindi


What is DVT - Deep Vein Thrombosis- In Hindi

पैरों में अचानक सूजन: कहीं यह खून के कतरों का जमाव तो नहीं
नियमित व्यायाम से इलाज मुमकिन

अचानक पैर में सूजन, गर्माहट और चलने-फिरने पर पैर में खिंचाव जैसे लक्षण डीप वेन थ्रोंबोसिस (डीवीटी) यानी पैरों की नसों में खून के कतरों का जमाव नामक गंभीर स्थिति के सूचक हो सकते हैं। सही इलाज न मिलने के कारण डीवीटी बीमारी गंभीर हो जाती है। रोगी की जान खतरे में पड़ सकती है। व्यायाम न करना और महिलाओं में गर्भनिरोधक दवाओं एवं हॉर्मोन के बढ़ते सेवन के कारण डीवीटी बढ़ने लगती हैं। हाई हील सैंडल पहनने से भी बीमारी का खतरा बढ़ता है। इसके अलावा फेफड़े, या आंतों का कैंसर होने या किसी बीमारी के कारण खून जरूरत से ज्यादा गाढ़ा हो जाने से यह भी रोग हो सकता है।

पैर या हाथों की वेन्स ऑक्सीज़न रहित गंदे खून को इकट्ठा करके हृदय की ओर ले जाती है। वंहा से अशुद्ध रक्त शुद्ध होने के लिए फेफड़े में जाता है। कई बार में खून के कतरे इन वेन्स में जमा होकर रक्त के बहाव को रोक देते हैं। इससे वेन्स जाम हो जाती है, जिसके कारण पैर या हाथ में सूजन आने लगती है। गंदे रक्त के अलावा शरीर का पानी और इलेक्ट्रोलाइटस एवं खनिज जैसे जरूरी अवयव भी जमा हो जाते हैं। इससे वेन्स में टिश्यू प्रेशर बढ़ जाता है। इससे शुद्ध रक्त ले जाने वाली रक्त धमनियों का बहाव रुक जाता है। इससे पैर अथवा हाथ काले पड़ने लगते हैं और गैंगरीन नामक भंयकर अवस्था की शुरूआत हो जाती है।

रोग का सही वक्त पर इलाज न होने या गलत इलाज, लापरवाही बरतने और आराम न करने पर वेन्स में इकट्ठे हुए रक्त के कतरे दिल से होकर फेफड़े की नली में इकट्ठा होने लगते हैं। इससे पल्मोनरी इम्बोलिज़्म की अत्यंत जानलेवा स्थिति पैदा होती हैं। इस स्थिति में मरीज की सांस फूलने लगती है। रक्तचाप नीचे गिर जाता है।

डीवीटी के मरीजों को आमतौर पर खून की नस के जरिए रक्त को पतला करने वाली दवाएं अधिक मात्रा में दी जाती है, लेकिन मरीज में पल्मोनरी इम्बोलिज़्म की शुरूआत हो जाए तो थ्रोम्बोलाइटिक थैरेपी दी जाती है। ऐसे रोगियों के लिए अत्याधुनिक उपकरणों वाले आईसीयू की जरूरत होती है। 

यह बीमारी तब खतरनाक रूप ले लेती है जब रोग से ग्रत पैर खराब होने की आशंका बढ़ जाए। ऐसी स्थिति में तत्काल वेन्स थ्रोम्बेक्टोमी ऑपरेशन की जरूरत पड़ती हैं। इस इस ऑपरेशन में मोटी वेन्स को खोल कर खून के कतरे निकाल दिए जाते हैं और धमनी को वेन्स से जोड़कर धमनियों का शुद्ध रक्त शिराओं में डाला जाता है। पल्मोनरी इम्बोलिज़्म की किछ विशेष परिस्थितियों में पेट की मोटी एवं मुख्य वेन्स में एंजियोग्राफी या ऑपरेशन के जरिए आईवीसी फिल्टर डाला जाता है, जिससे पैर की वेन्स में जमे खून के कतरे पेट की वेन्स में रुक जाएं और दिल के जरिए फेफड़े तक न पहुंचे। डीवीटी के काफी मरीजों में इलाज के बावजूद पोस्ट थ्रोम्बोहटिक सिंड्रोम होने की संभावना बनी रहती है। इसमें वेन्स के वाल्व क्षतिग्रस्त हो जाते हैं। ऐसे मरीजों को उम्रभर व्यायाम करना चाहिए, ताकि आगे चलकर उनमें वेरिकोस वेन्स, और वेरिकोस अल्सर उत्पन्न न हो।

बीमारी की रोकथाम के लिए रोज तीन से चार किलोमीटर सैर करने तथा पैरों की कसरत करने से पैरों की वेन्स में ऑक्सीज़न रहित गंदे रक्त को रोकने का मौका नहीं मिलता और मांसपेशियों का पम्प अच्छी तरह कम करता है। लंबे समय तक बेडरेस्ट में रहने वालों, कैंसर व लकवा के मरीजों, नवजात शिशुओं की माताओं तथा गर्भ निरोधक गोलियों एवं हॉर्मोन का सेवन करने वाली महिलाओं को सावधान रहना चाहिए।

डॉ के के पाण्डेय
सीनियर वैस्कुलर व कार्डियो
थोरेसिक सर्जन इंद्रपस्थ
अपोलो अस्पताल, नई दिल्ली।

Health Tips with Home Remedies In Hindi

Health Tips In Hindi आरोग्य का आंदोलन

खुद को फिट रखने के लिए हम बाज़ार मे बिकने वाले तमाम उत्पादों को प्रयोग मे लाते हैं लेकिन फिर भी हमें रोगों से निजात नहीं मिल पाती है। वहीं यदि हम अपनी आदतों में थोड़ा बदलाव लें आएं और कुछ देसी नुख्सों को अपनाएं तो सेहत को संवारा जा सकता है। आइए जानते हैं इन के बारे में।

दांतों की मजबूती के लिए - 

सेंधा नमक, हल्दी पाउडर व सरसों के तेल को मिलाकर मध्यम अंगुली से दांतों को साफ करें। हल्दी एंटीबायोटिक का काम करती है। लेकिन इसका प्रयोग सिर्फ 15 दिन तक करें। 15 दिनों में ये हमारे मसूढ़ों को मजबूत कर देती है। इससे अधिक समय तक प्रयोग में लाने से दांतों में पीलापन होने का खतरा रहता है।

मल विसर्जन के वक्त दांतों को भीचकर रखें। इससे दांत हमेंशा मजबूत बने रहेंगे।

घर पर बना पेस्ट भी इस्तेमाल कर सकतें है इसके लिए 75 ग्राम सेंधा नमक, 25 ग्राम मुलतानी मिट्टी, 5 ग्राम लोंग का तेल, 5 ग्राम फिटकरी, 5 ग्राम यूकेलिप्टस (नीलगिरी) का तेल, 5 ग्राम मिंट, 10 ग्राम हल्दी पाउडर व सरसों के तेल को मिलाकर प्रयोग कर सकते हैं।

दांतों को दिन में 2 बार साफ करें।

त्वचा व बाल बनाएं स्वस्थ्य- 

नहाते वक्त साबुन के स्थान पर बेसन, हल्दी, सरसों का तेल, नींबू का रस व दूध को मिलाकर उबटन लगाने से शरीर की चमक बढ़ती है।

दही व चिकनी मिट्टी को मिलाकर सिर में शंपू की तरह प्रयोग करने से बाल घने होंगें।

सर्दियों में सरसों का तेल व गर्मियों में नारियल का तेल में कुछ बुंदे नींबू के रस की मिलाकर मालिस करने से बाल मजबूत होते हैं, इसी तेल से पैरों के तलवों पर मालिस करने से जोड़ों में दर्द की समस्या दूर होगी।

इन बातों का रखें खयाल -

तेज भूख लगने पर ही भोजन करें। खाने को अच्छी तरह चबाएं। भोजन करते समय सारा ध्यान खाने पर केंद्रित करें। न बात करें और न ही टीवी देखें।

खाने के तुरंत बाद पानी न पिएं।

कोल्ड ड्रिंक आदि की बजाय दूध, लस्सी, छाछ, गन्ने का रस व फलों के जूस आदि का प्रयोग करें।

पान, तंबाकू, धूम्रपान, गुटखे व शराब आदि का सेवन न करें।

चाय के बदले नींबू पानी या तांबे के बर्तन में रखे पानी का प्रयोग करें। तांबे के बर्तन में पानी भरकर इसे लकड़ी के पटरे पर रातभर रखें। सुबह होने पर इस पानी को उकड़ू बैठकर पिएं।

अरुण ऋषि (स्वर्गीय), उज्जैन

एक्जिमा (Eczema) Cream

Eczema Cream - एक्जिमा में मददगार होगी नई क्रीम

एक्जिमा, बाल झड़ने व आर्थराइटिस से लड़ने के लिए वैज्ञानिकों ने एक नई क्रीम तैयार की है। नोलान रिसर्च इंस्टीटयूट के वैज्ञानिकों के अनुसार ये रोग हमें तब सताते हैं जब हमारी स्वस्थ्य कोशिकाएं प्रभावित होने लगती हैं। वैज्ञानिकों ने इसे उपरोक्त तीनों रोगों के लिए प्रभावी माना है। साथ ही इस क्रीम के कोई दुष्प्रभाव भी नहीं हैं। इस क्रीम को गर्भनाल के स्टेम सेल्स से तैयार किया गया है।