Sunday, 18 October 2015

What is cervical spondylosis treatment - In Hindi

Cervical Spondylosis: Causes, Symptoms, & Treatment
In Hindi - सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस -स्पॉन्डिलाइटिस क्या है

आधुनिक जीवनशैली में कुछ बीमारियां ऐसी हैं जो लंबे समय तक एक जैसे बैठने के कारण होती हैं। इनमें कमर एवं गर्दन का दर्द प्रमुख है। इसका मुख्य कारण होता है ‘स्पॉन्डिलाइटिस सर्वाइकल'| स्पॉन्डिलाइटिस से गर्दन और रीढ़ की हड्डी ज्यादा प्रभावित होती हैं। इसकी समस्या 10 से 7 लोगों में दिखती है।

‘स्पॉन्डिलाइटिस’ क्या है? 

ये रिढ़ की हड्डी से संबन्धित रोग है। इस रोग में रिढ़ की हड्डी में सूजन आ जाती है। दो स्पॉन्डिलाइटिस यूनानी शब्द ‘स्पॉन्डिल’ तथा ‘आइटिस’ से मिलकर बना है स्पॉन्डिल का अर्थ है कशेरुका ‘वर्टिब्रा’ तथा आइटिस का अर्थ सूजन होता है अर्थात कशेरुका या वर्टिब्रा (रीढ़ की हड्डी) में सूजन की शिकायत को ही स्पॉन्डिलाइटिस कहा जाता है। इसमें पीड़ित को गर्दन को दाएं-बाएं और ऊपर-नीचे करने में काफी दर्द होता है। यह केवल सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस की बात की जा रही है।

कारण :  इस बीमारी का सबसे बड़ा कारण बढ़ती उम्र और खराब जीवनशैली है। घंटों एक ही स्थिति में लंबे समय तक काम करने से गर्दन या कमर प्रभावित होती है। नियमित रूप से व्यायाम नहीं कर पाना भी एक और कारण है। इससे गर्दन की हड्डी पर दबाव बढ़ता है। फलत: समूचे शरीर पर नियंत्रण रखने वाली रक्त कोशिकाएं क्षतिग्रस्त हो सकती हैं और जोड़ खराब हो सकता है इसके कारण स्पाइनल कॉर्ड (मेरूरुज्जा) पर दबाव पड़ता है। उस पर हल्का झटका लगने से लकवा हो सकता है। सिर झुकाकर काम करने वालों के इस रोग से ग्रसित होने की आशंका अधिक होती है। जो लगातार कम्प्यूटर पर काम करते हैं, उनके सवाईकल स्पोंडीलाइटिस की आशंका अधिक होती है। जो लोग भारी बोझ उठाने और उतारने का काम करते हैं, उनके भी कंधे व कमर में स्पोंडीलाइटिस की आशंका बढ़ जाती है। 

लक्षण: इससे पीड़ित व्यक्ति को पीठ दर्द के साथ कंधे और गर्दन में वेदना, कोई काम करने में पीड़ा, कोई चीज उठाते समय दर्द, हाथ पैर में झुनझुनी, सिर में भारीपन या चक्कर आना, लेटकर तुरंत उठते वक्त चक्कर आनया नशा-सा महसूस होना इत्यादि लक्षण दिखाई देते हैं। कुछ लोगों को सिरदर्द, चुभन या सुन्न होने की शिकायत हो सकती है। स्पोंडीलाइटिस से आमतौर पर 30-50 साल के आयु वर्ग के लोग अधिक पीड़ित होते हैं। रीढ़ की हड्डी में अकड़न पैदा हो जाती है। इसके इलाज में देरी या लापरवाही नहीं करनी चाहिए। इलाज में देरी या लापरवाही से शरीर को नुकसान होता है। इसके बने रहने पर यह शरीर के अन्य प्रमुख जोड़ों को भी प्रभावित करता है। 

रोकथाम: समान्यत: गर्दन और कमर के स्पोंडीलाइटिस को शुरू में व्यायाम, दर्द निवारक दवाएं, बेल्ट बांधने इत्यादि से ठीक किया जा सकता है। बीमारी बढ्ने पर जांच करानी चाहिए और कुछ को ऑपरेशन कराना भी आवश्यक हो जाता है। खासकर उन लोगों को जिन्हें नसों या स्पाइनल कार्ड पर दबाव पड़ने की वजह से कई तरह की समस्याएं हो जाती हैं, लेकिन इस बीमारी से ग्रसित होने की आशंका वाले लोग थोड़ा सजग होकर इस रोग से बचाव कर सकते हैं। चिकित्सक से पूछकर कुछ विशेष प्रकार का व्यायाम करके इस रोग को नियंत्रित रखा जा सकता है। 
जब आराम न मिले और स्पोंडिलाइटिस के कारण आस-पास की नसों में दर्द या सूजन फ़ेल जाने की स्थिति में स्पाइन विशेषज्ञ से सलाह लेना आवश्यक होता है। स्पाइन विशेषज्ञ ही जांच के बाद बता सकता है कि नसों में दर्द या सूजन स्नायु रोग के कारण है या नहीं। गर्दन आपको आराम देने के लिए सर्वाइकल कॉलर पहननी चाहिए। 

बचाव व इलाज : सर्वाइकल स्पोंडिलाइटिस में प्रभावित स्थान पर गर्म पानी के बैग या बर्फ के टुकड़ों से सिकाई करना भी एक अच्छा विकल्प है। इससे जल्दी ही राहत मिलती है, लेकिन यह लगातार करना होता है। सर्जरी की सलाह तब ही दी जाती है जब यह समस्या मस्तिष्क की नसों तक क्षति पहुंचाने लगे और प्राथमिक उपचारों से आराम न मिले। इसमें इंटीरियर सर्वाइकल डिस्केटोमी एंड फ्यूजन नाम की सर्जरी की जाती है। इसमें प्रभावित डिस्क को हटाकर बोन ग्राफ्ट लगाया जाता है, जिसमें हिप के आस-पास से बोन का छोटा हिस्सा निकालकर, हटाई गई डिस्क की जगह लगा दिया जाता है। जिन लोगों में एक से अधिक नसें प्रभावित होती हैं उनमें सर्वाइकल लेमिनेक्टोमी की प्रक्रिया अपनाई जाती है। इस तरह की सर्जरी में कुल 60 से 80 हजार रुपए तक खर्च आता है। 

फ़ैक्ट : सर्वाइकल के अलावा रुमेटाइड और एंकीलोजिंग स्पोंडिलाइटिस भी होते हैं। इसमें एंकीलोजिंग सबसे ज्यादा गंभीर माना जाता है। 


ए.बी. गोरेगांवकर


प्रोफेसर और हेड ऑफ आर्थोपेडिक्स, एलटीएम मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल, सायन, मुंबई

Kidney Disease Causes and Basic Information किडनी से संबंधित समस्याएं

किडनी से संबंधित समस्याएं
Types of kidney disease-what is kidney and its function
Kidney Disease Causes and Basic Information


आज भारत देश मे लगभग 5 लाख ऐसे मरीज हैं, जिनकी किडनी पूरी तरह खराब हो चुकी है। हर साल एक लाख नए मरीज बढ़ जाते हैं। देश के प्रत्येक 2000 परिवार में से एक परिवार इस बिमारी से ग्रसित है। केवल 2 प्रतिशत लोगों को ही उचित उपचार मिल पता है। 

क्या है किडनी एवं इसका कार्य  - 

किडनी  व्यर्थ पदार्थों और तरल पदार्थों की अत्यधिक मात्रा को शरीर से बाहर निकालकर रक्त को साफ करती हैं। रक्त में सॉल्ट और धातुओं की मात्रा को संतुलित रखती हैं। ये ही ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करने में सहायता करती हैं। ये शरीर में पानी की मात्रा को संतुलित करती हैं। एक किडनी 2 इंच चौड़ी, 1.5 इंच मोटी और 4 इंच लंबी होती है। किडनी लाखों छलनियों तथा लगभग 140 मील लम्बी नलिकाओं से बनी होती है। किडनी की इन इकाइयों को नैफ्रॉन कहते है। एक किडनी में लगभग 10 लाख ऐसी इकाई होती है, जो माइक्रोस्कोप से देखी जा सकती है। नलिकाएं छने हुए द्रव में से शरीर के लिए उपयोगी सोडियम, पोटेशियम, कैल्शियम इत्यादि को दोबारा सोख लेती हैं। हर दिन औसत 1.5 लीटर यूरिन के रूप में बाहर निकाल देती है। 

किडनी से संबंधित समस्याएं -

क्रॉनिक किडनी डिसीज (सीकेडी): सीकेडी को एस्टाब्लिशड रीनल फेलियर (ईआरएफ) या एंड स्टेज किडनी डिसीज कहते हैं। इसमें किडनी की कार्यक्षमता धीरे-धीरे कम होती जाती है। किडनी सामान्य कार्य नहीँ कर पाती है और क्षमता कम हो जाती है। सीकेडी से पीड़ित आधे लोग अस्पताल तब जाते हैं जब उनकी किडनी आधा ही कम कर पाती है। पहले और दूसरे चरण में ही रोग का पता लग जाए तो दवाओं से रोग बढने से रोका जा सकता है।

किडनी में सूजन : इसमें किडनी की फिल्टरिंग इकाइयों में सूजन आ जाती है। वे क्षतिग्रस्त हो जाती है। ये डिसऑर्डर तीसरा सबसे आम है। इसे ग्लोमेरूलोनेफ्रीटाइटिस कहते हैं।

पॉलीसिस्टिक किडनी डिसीज :  यह एक अनुवांशिक रोग है, इसमें किडनी में सिस्ट बन जाते हैं।
किडनी में इंफेक्शन : इसमें संक्रमण को पायलोनेफ्रिटिस भी कहते हैं। यह संक्रमण किडनी स्टोन के कारण हो सकता है। इससे मूत्र के किडनी से बाहर की ओर प्रवाह में रुकावट आती है और मूत्र वापस किडनी में आ जाता है। इससे किडनी में संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। वैसे किडनी और मूत्र मार्ग के 80 प्रतिशत संक्रमण ई कोलाइ और अन्य बैक्टीरिया के कारण होते हैं। ई कोलाई संक्रमण दूषित आहार व जल से होता है।

किडनी फेल : गंभीर रोग में किडनी फेल हो सकती है। इसमें किडनी सामान्य गतिविधियों का 15 प्रतिशत से भी कम काम कर पाती है। इसे एंड स्टेज रीनल डिसीज (ईएसआरडी) कहते हैं। 

कारण : किडनी खराबी के यूं तो बहुत सारे कारण हैं लेकिन मुख्य कारण निम्न हैं-

डायबिटीज़, हाई ब्लड प्रेशर, किडनी में पथरी, किडनी रोगों का पारिवारिक इतिहास, मोटापा, कोलेस्ट्रॉल बढना, प्रोस्टेट की बीमारियां। पेनकीलर और दूसरी कई दवाओं का अधिक प्रयोग। रजत भस्म और स्वर्णभस्म युक्त आदि दवाएं प्रयोग में लेने से।

लक्षण : इसमें शरीर में सूजन का आना, भूख की कमी, उल्टी आना, खून की कमी, हड्डियां कमजोर, थकान लगना। सांस फूलना, ब्लड प्रेशर बढ़ जाना, मूत्र की मात्रा में कमी होना, मूत्र मे रक्त आना।

इलाज यें हैं-

डायलिसिस : यह प्रक्रिया है जो स्वस्थ किडनी के समान कार्य करती है। इससे शरीर से अतिरिक्त तरल व्यर्थ पदार्थों को निकाल कर इलेक्ट्रोलाइट का संतुलन रखा जाता है।

हीमोडायलिसिस : इसमें कृत्रिम किडनी/ फिल्टर द्वारा मशीन से रक्त साफ किया जाता है। इसमें दो सुइयां इस्तेमाल होती हैं। एक सुई से गंदा खून मशीन व कृत्रिम गुर्दे में जाता है दूसरी सुईं से साफ खून वापिस शरीर में लौटता है। एक व्यक्ति को औसतन प्रति सप्ताह दो से तीन बार हीमोडायलिसिस करवाना होता है।

डॉ रमेश जैन - एचओडी, किडनी ट्रांसप्लांटेशन सेंटर, सरोज सुपर स्पेशलिटी अस्पताल, नई दिल्ली

Healthy Home Made Soup - पौष्टिकता से भरपूर घर का बना सूप

Healthy Home Made Soup - पौष्टिकता से भरपूर घर का बना सूप
healthy homemade soup benefits

बाजार में बिकने वाले रेडीमेड इंसटेंट सूप लोग पसंद करते हैं। लेकिन घर पर बनने वाले सूप की बात ही कुछ और है। आइए जानते हैं घर पर बने विभिन्न प्रकार के सूप के फायदों के बारे में।

मिक्स वेजिटेबिल: पालक, पुदीना, चुकंदर, लौकी, टमाटर, आंवला व अदरक से बने मिक्स वेजिटेबिल सूप में आयरन व फॉस्फोर्स के अलावा विटामिन-बी, सी व डी पाया जाता है। यह पीलिया, लीवर, कब्ज, भूख बढ़ाने व आंखों के लिए लाभकारी है। चर्मरोग और शरीर में सूजन होने पर इसे न लें। अगर हाई ब्लड प्रेशर की समस्या हो तो इसे बनाते वक्त नमक का प्रयोग न करें। 

लौकी : इसमें कार्बोहाइड्रेट, आयरन, विटामिन-बी व मिनरल्स पाए जाते हैं। हल्का होने के कारण यह पेट में भारीपन, भूख न लगना या लीवर संबंधी समस्या में लाभकारी है। इसके अलावा यह पित्तनाशक व खून बढ़ाने वाला होता है। इसे किसी भी व्यक्ति को दिया जा सकता है। 

पिंड-आंवला : पिंड खजूर व आंवला से बने सूप में प्रचुर मात्र में आइरन, मिनरल्स व विटामिन-सी और डी पाए जाते हैं। यह शारीरिक कमजोरी, ह्रदय संबंधी रोग व आंखों की कमजोरी को दूर करने में सहायक हैं। दस्त या बदहजमी होने पर इसे न लें। 

सही तरीका : सूप को हमेशा भोजन के पहले लेना चाहिए। लेकिन अगर आप सुबह के समय इसे ले रहे हैं तो नाश्ते के बाद पिएं। खाली पेट सूप सेहत के लिए नुकसानदायक हो सकता है। इसे लेने के पहले या बाद में एक घंटे तक दूध या चाय न पिएं। इससे पेट में एसिडिटी या किसी अन्य प्रकार की दिक्कत होने की आशंका रहती है।

ध्यान रखे : जहां तक संभव हो सूप को हमेशा ताजा बनाकर पिएं। एक दिन से ज्यादा रखा हुआ सूप न पिएं क्योंकि इसमें बैक्टीरिया उत्पन्न होने का खतरा रहता है। हमेशा गर्म सूप पिएं और इसे बनाते समय मक्खन, घी, तेल या किसी अन्य चिकने पदार्थ का प्रयोग न करें वर्ना वसा की अधिक मात्रा मोटापा बढ़ा सकती है।

वैध पदम जैन, आयुर्वेद, विशेषज्ञ

Rain and Eye Conjunctivitis in Hindi

Rain and Eye Conjunctivitis - In Hindi
बारिश में रखें आंखों का खयाल - कंजंक्टिवाइटिस


मानसून के दौरान आंखों में कुछ विशेष प्रकार के रोंगों की आशंका बढ़ जाती है जिसमें कंजंक्टिवाइटिस मुख्य हैं। इस रोग में आंखों में लालिमा, खुजली, जलन, आंखें चिपकना व धुंधला दिखाई देना जैसे लक्षण हो सकते हैं जानते हैं इस रोग से बजाव के बारे में।

एलर्जिक कंजंक्टिवाइटिस : इस रोग में पीड़ित व्यक्ति की आंखों में तेज खुजली, लालिमा, सूजन, जलन व भारीपन जैसे लक्षण हो सकते हैं।

बैक्टीरियल कंजंक्टिवाइटिस : आंखों में चुभन, लालिमा, व पानी आना जैसे लक्षण इस रोग में होने लगते है। पीड़ित व्यक्ति को इस दौरान अपना तौलिया/ रुमाल/ कपड़े आदि अलग रखने चाहिए ताकि संक्रमण दूसरे व्यक्तियों में ना फैले।

वायरल कंजंक्टिवाइटिस : इससे आंखों में लालिमा व धुंधला दिखाई देने जैसे लक्षण हो सकते हैं। यह वायरल आई फ्लू एडीनोवायरस (टाईप 8 व 19) से हो सकता है। इससे कभी-कभी कानों के पास कनपटी पर सूजन भी हो सकती है और कॉर्निया में सूक्ष्म जख्म होने से दिखना भी कम हो जाता है। यह एक या दोनों आंखों को प्रभावित करता हैं। इस समस्या के इलाज में देरी से धुंधलापन हमेशा के लिए भी हो सकता है।

कैमिकल कंजंक्टिवाइटिस : स्वीमिंग पूल में नहाने के बाद आंखों में खुजली, जलन या किरकिरी लगना आदि लक्षण हो सकते हैं।

सावधानी बरतें -

आंखों को रोजाना ठंडे पानी से 3-4 बार धोलें। मानसून में आंखों में सुखपन होता है इसलिए इन्हे रगड़े या मसलने नहीं।
अपना तौलिया या रुमाल आदि किसी के साथ शेयर न करें।
नियमित रूप से हाथों को धोएं। गंदे हाथों से आंखों को छूने से बचें वर्ना संक्रमण का खतरा रहता है।
मानसून के दिनों में आई मेकअप से परहेज करें। आंखों का कोई रोग होने पर विशेषज्ञ की सलाह के बाद ही आई ड्रॉप आदि का प्रयोग करें।

डॉ. सुरेश कुमार पाण्डेय, नेत्र सर्जन