Thursday, 3 December 2015

हेमोक्रोमैटोसिस Hemochromatosis cause symptoms and treatment

What is Hemochromatosis in Hindi
Hemochromatosis cause symptoms and treatment

शरीर मे आयरन जमा होना यानी हेमोक्रोमैटोसिस हो तो इससे अंग प्रभावित होने लगते हैं। शरीर मे आयरन का स्तर 3-4 ग्राम होता है। आयरन की संपूर्ण मात्रा बड़ी सावधानी से नियंत्रित होती है। हर दिन एक मिग्रा. आयरन पसीने, तवचा की मृत कोशिकाओं और आंतों की अंदरूनी परत गिरने से निकलता है।

महिलाओं के शरीर से मासिक धर्म के दौरान प्रतिदिन औसतन एक मिलीग्राम आयरन बाहर निकल जाता है। सामान्य वयस्क व्यक्ति में इस आयरन की क्षति की भरपाई करने के लिए प्रतिदिन एक मिलीग्राम आयरन अवशोषित होता है। यही कारण है कि शरीर में आयरन की अतिरिक्त मात्रा जमा नहीं हो पाती। जब शरीर अधिक मात्रा में आयरन खोता है, तब स्वभाविक रूप से आयरन का अवशोषण भी बढ़ जाता है। लेकिन जो लोग हेमोक्रोमैटोसिस से पीड़ित होते हैं, उनमें प्रतिदिन आंतों से उससे अधिक मात्रा में आयरन अवशोषित होता है, जितनी आवश्यकता शरीर को खोए हुए आयरन से बदलने के लिए होती है।

क्या होता है हेमोक्रोमैटोसिस?

हेमोक्रोमैटोसिस आयरन मेटाबॉलिज़्म की एक आनुवांशिक गड़बड़ी है। हेमोक्रोमैटोसिस में, रोगी के शरीर से आयरन बाहर निकालने की बजाय जमा होने लगता है। जिन अंगों के टिश्यू में आयरन का जमाव होने लगता है, उनकी कार्यप्रणाली आसामान्य हो जाती है और इसके कारण गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं हो जाती हैं।

कारण: हेमोक्रोमैटोसिस आनुवांशिकी से संबंधित है, जो बच्चों को उनके माता-पिता से विरासत में मिलता है। यह उन जींस में म्युटेशन के द्वारा होता, जो शरीर में आयरन की मात्रा को नियंत्रित करते हैं।

लक्षण और स्वास्थ्य जटिलताएं: आयरन की यह अधिक मात्रा जोड़ों, लीवर टेस्टिकल और हृदय में जमा हो जाती है। फिर इन अंगों को क्षति पहुंचाती है। जो महिलाएं इस रोग से पीड़ित होती हैं, उनके शरीर में आयरन का संग्रह पुरुषों की तुलना में धीमी गति से होता है, क्योंकि मासिक धर्म और स्तनपान के दौरान उनके शरीर से काफी मात्रा में आयरन बाहर निकल जाता है। इसलिए उनमें हेमोक्रोमैटोसिस के कारण होने वाले अंगों की क्षति के लक्षण पुरुषों की तुलना में दस वर्ष बाद दिखाई देते हैं।

पुरुषों में इससे तवचा का रंग गहरा होता है।
टेस्टिकल में आयरन के जमने से वे सिकुड़ जाते जो न्ंपुसकता का कारण बन सकते हैं।
अग्नाशय में इसके जमा होने से इंसुलिन बनना कम हो जाता है, जिससे डायबिटीज़ हो सकती है।
हृदय की मांसपेशियों में आयरन के जमा होने से कार्डियोमायोपैथी हो सकती है, किसके कारण हार्ट फेलियर होने की आशंका बढ़ जाती है। इसकी अधिक मात्रा हृदय की धड़कनों को अनियमित करती है, जिसे अरदिमिया कहते हैं।
लिवर में जमा होने से लिवर सिरोसिस और लिवर कैंसर होने का खतरा बढ़ जाता है।
फेफड़ों में जमने से सांस की समस्या होती है।
जोड़ों में जमाव जोड़ों के दर्द का कारण बनता है।
जब एंडोक्राइन ग्रंथियों में जमाव हो तो हार्मोन्स का संतुलन गड़बड़ा जाता है।

रोकथाम और उपचार: इसको रोकने का सबसे कारगर उपाय स्क्रीनिंग है। एक बार जब किसी व्यक्ति में हेमोक्रोमैटोसिस की पहचान हो जाए, तब उसके सभी भाई-बहनों और रिशतेदारों को स्क्रीनिंग करानी चाहिए। यदि उन्हे यह रोग है, तब उन्हे तुरंत इलाज करना चाहिए। 

हेमोक्रोमैटोसिस का सबसे प्रभावी उपचार फ्लेमबोटॉमी यानी भुजाओं की शिराओं से रक्त निकालना। इसके द्वारा शरीर में आयरन के स्तर को कम किया जा सकता है। इसमें एक या दो हफ्ते में रक्त की एक यूनिट निकाली जाती है, जिसमें लगभग 250 मिलीग्राम आयरन होता है। धीरे-धीरे इस प्रक्रिया को दो-तीन महीनें में एक बार किया जाता है। इससे उन अंगों की कार्यप्रणाली सुधर जाती है जो आयरन के जमाव के कारण प्रभावित हो गई थी। 

नियमित रूप से रक्तदान करना भी हेमोक्रोमैटोसिस का एक उपचार हो सकता है। एक अध्ययन में यह बात सामने आई है कि जिनके शरीर में आयरन अधिक मात्रा में संग्रहीत है अगर वो नियमित रूप से रक्तदान करेंगें तो उनकी इंसुलिन के प्रति संवेदनशीलता और डायविटीज़ की समस्या समाप्त हो जाएगी। जो एनीमिया या हृदय से संबंधित जटिलताओं के कारण रक्त नहीं निकलवा सकते उनके लिए कीलैशन उपचार है। इसमें शरीर से आयरन निकालने के लिए कुछ दवाइयां दि जाती है।

डॉ. गौरव खरया
कंसल्टेंट पीडियाट्रिक्स,
इमेटोऑन्कोलॉजी,
इम्युनोलॉजी, एवं बोन मैरो
ट्रांसप्लांट, नई दिल्ली


मल्टीपल स्क्लेरोसिस Multiple Sclerosis Cause Symptoms Treatment in Hindi

Multiple Sclerosis Cause Symptoms Treatment in Hindi
मल्टीपल स्क्लेरोसिस

मल्टीपल स्क्लेरोसिस यानी MS क्रॉनिक बीमारी है, जो आपके मस्तिष्क, रीढ़ और आंखों की ऑप्टिक तंत्रिकाओं को प्रभावित करती है। यह दृष्टि, संतुलन, मांसपेशियों पर नियंत्रण तथा शरीर की अन्य सामान्य गतिविधियों में समस्या पैदा कर सकती है। इससे दैनिक कार्य नहीं कर सकते हैं, पर यह लकवे से अलग है।

आमतौर पर एमएस को ऑटोइम्यून रोग समझा जाता है, जिसमें शरीर की रोगप्रतिरोधक प्रणाली ऐसी कोशिकाएं और प्रोटीन (एंटीबॉडीज) बनाने लगती है, जो मायलिन को नुकसान पहुंचाने लगती है, जो मायलिन एक वसायुक्त तत्व है, जो तंत्रिकाओं के फाइबर की रक्षा करता है।

MS की वजह: MS का कारण तो ज्ञात नहीं है, लेकिन केंद्रीय तंत्रिका का यह रोग पुरुषों की तुलना में महिलाओं को 2.5 गुना ज्यादा प्रभावित करता है। यह आनुवांशिक रोग भी नहीं है, लेकिन कुछ लोगों में यह रोग पनपने की आशंका बढ़ाने वाले कुछ आनुवांशिक कारकों की अहम भूमिका भी होती है। धूम्रपान से इसका अधिक खतरा रहता है।

लक्षण: ज़्यादातर मरीजों को पहली बार लक्षण 20-40 वर्ष की उम्र में महसूस होते है। यह तंत्रिकाओं के क्षतिग्रस्त होने वाले स्थान पर निर्भर करता है की किस व्यक्ति पर इस रोग का कितना असर होगा। यह रोग आंशिक, सामान्यता गंभीर हो सकता है। क्षतिग्रस्त होने का मतलब है कि आपका मस्तिष्क आपके शरीर के अन्य हिस्सों को सही तरीके से संदेश नहीं पहुंचा सकता है। इसके परिणामस्वरूप आपकी तंत्रिकाएं भी काम करना बंद कर देती हैं, जबकि इन्हे आपके चलने-फिरने और अहसास करने में मदद करनी चाहिए।

कुछ लक्षण जो जल्दी उभरते हैं- दृस्टी समस्या, ऑप्टिक न्यूराइटिस, आंखों की तंत्रिकाओं में जलन आदि शुरुआती आम लक्षण हैं। मरीज को शुरु-शुरू में धुंधली या दो-दो चीजें नजर आने की शिकायत हो सकती है और आमतौर पर एक एक आंख की समस्या के कारण होता है। जैसे-जैसे स्थिति बिगड़ती है, मरीज की दृष्टि कमजोर हो जाती है। दृष्टिहीनता के मामले बहुत कम ही होते हैं।

सिहरन और संवेदनशून्यता या जलन का अहसास या संवेदना की कमी हो सकती है। अत्यंत गर्मी या ठंडक की अनुभूति। ये लक्षण अक्सर पैरों या बांह के आखिरी छोर से शुरू होते हैं और ऊपर बढ़ते हुए पैर के आरंभ बिंदु तक पहुंच जाते है। मांसपेशियों की कमजोरी और मरोड़, पैरों में कमजोरी, बेचैनी या भारीपन महसूस कर सकता है। उन्हे तेजी से उंगलियां चलाने में भी दिक्कत आ सकती है।

संतुलन और तालमेल बनाने की समस्याएं- मरीज की चाल अनियंत्रित हो जाती है और चलने तथा संतुलन बनाए रखने में दिक्कत आती है। ये समस्याएं चक्कर आने और कंपकंपी जैसे एमएस के अन्य सामान्य लक्षणों के कारण बढ़ सकती है।

थकान: थकान एमएस का सबसे सामान्य और लाचार कर देने वाला लक्षण है। और अक्सर यह रोग की शुरुआत से ही बढ़ने लगती है। यह तकरीबन सभी मरीजों में पाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण लक्षण है। याद रखें कि सभी मरीजों में सभी लक्षण नहीं होते हैं। साथ ही ज़्यादातर एमएस पीड़ितों को तभी दौरा पड़ता है, जब स्थिति बहुत ज्यादा बिगड़ जाती है। इसे रीलैप्स कहते है। समय के साथ यह बीमारी बदतर होती चली जाती है।

जांच: एमएस की जांच एक बड़ी चुनौती होती है, क्योंकि इसके लक्षण भी कई अन्य नर्व डिसऑर्डर की तरह ही होते हैं। दरअसल, किसी एक जांच से साबित नहीं हो सकता कि आप एमएस पीड़ित है। लिहाजा कई प्रकार की जांच करानी पड़ती है, जिनमें शामिल हैं-

रक्त जांच से पता चलता है कि व्यक्ति इससे पीड़ित है या नहीं, क्योंकि इसके कुछ लक्षण एड्स की तरह ही होते हैं। अपने संतुलन, समन्वय, दृष्टि और अन्य गतिविधियों की जांच कराकर देखें कि आपकी तंत्रिकाएं कितनी सक्रियता से काम कर रही है। एमआरआई से शरीर की संपूर्ण तस्वीर साफ हो जाती है। मस्तिष्क और स्पाइनल कॉर्ड में मौजूद द्रव्य सेरेब्रोस्पाइनल फ़्लड (सीएसएफ) कहलाता है। इसकी जांच से रोग का पता लगता है, क्योंकि एमएस पीड़ित लोगों के सीएसएफ में अमूमन खास प्रकार का प्रोटीन पाया जाता है।

इलाज: एमएस का अभी तक कोई खास इलाज नहीं निकला है। लेकिन कई प्रकार के उपचार से आपको अच्छा महसूस हो सकता है। डॉक्टर ऐसी दवाइयां देते है, जिनसे इस बीमारी की रफ्तार प्रक्रिया धीमी हो सकती है।

फ़ैक्ट- यदि किसी के माता-पिता इससे पीड़ित हैं, तो उस व्यक्ति में होने की आशंका तीन फीसदी रहती है।

डॉ. जयदीप बंसल
सीनियर कंसलटेंट,
न्यूरोलोजी, सरोज सुपर
स्पेशलिटी हॉस्पिटल, दिल्ली

स्ट्रोक - Stroke Warning Symptoms and Care

What is Stroke and its symptoms
How to cure stroke

वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन के ताजा डेटा के अनुसार हर वर्ष करीब 17 मिलियन लोगों की कार्डियो वेस्कुलर डिसिज के कारण मृत्यु होती है। इसमें भी हार्ट अटैक और स्ट्रोक सबसे आम है। जो लोग पहले से स्ट्रोक के शिकार है, उन्हे ध्यान रखना चाहिए कि दोबारा स्ट्रोक न हो। स्ट्रोक के खतरे को कम करने के लिए डॉक्टर कि मदद से ज्यादा बहुत चीजों की जरूरत है। 

हेल्दी लाइफस्टाइल अपनाकर स्ट्रोक से राहत मिल सकती है। 60 वर्ष की उम्र के बाद स्ट्रोक के केस आम हैं। 15 से 59 वर्ष के लोगों के बीच स्ट्रोक पांचवां सबसे बड़ा कारण है। 

जब दिमाग तक पहुंचने वाले खून में कोई अड़चन आती है या ब्लड वैसल लीक या बस्ट करते हैं, तभी स्ट्रोक आता है। हाई स्ट्रैस जॉब से भी स्ट्रोक की संभावना तेजी के साथ बढ़ने लगती है। इसके अलावा धूम्रपान, शराब का ज्यादा सेवन, फिजिकल एक्टिविटीज़ कम होनी या खान-पान की आदतें अच्छे न होने के कारण भी स्ट्रोक की आशंका बढ़ जाती है। इन कुछ आदतों को अपनी दिनचर्या में शामिल करने से स्ट्रोक के खतरे को टाला जा सकता है। जानिए इसके बारे में-

  • ब्लड प्रैशर और शुगर लेवल पर विशेष ध्यान दीजिए। हाई ब्लड प्रैशर होने के कारण आर्टरीज़ पर दबाव पड़ता है जिससे वे बस्ट हो जाती है नतीजा होता है स्ट्रोक। डायबिटीज़ भी आर्टरीज़ के लिए हानिकारक है। 
  • वजन और बीएमआई को भी कंट्रोल में रखिए। आपका वजन, आइडल वेट से 10 फीसदी ही ज्यादा होना चाहिए। इससे ज्यादा घातक है।
  • धूम्रपन की आदत छोडकर, दूसरे स्ट्रोक के खतरे को टाला जा सकता है। कोई आदत स्ट्रोक के लिए सबसे खराब है तो वे धूम्रपान है। शराब का सेवन कम करिए। क्योंकि शराब पीने से ब्लड प्रैशर बढ़ने लगता है जो स्ट्रोक के लिए घातक साबित होता है। 
  • रिलैक्स रहिए। तनाव को कम करने की कोशिश करिए, क्योंकि तनाव के कारण भी ब्लड प्रेशर बढ़ता है। 
  • पर्याप्त नींद लें और शरीर को रिचार्ज करने के लिए समय-समय पर ब्रेक लें। 
  • एंटिऑक्सीडेंट व फाइबर से भरपूर डाइट खाइए। रोज व्यायाम करिए। वॉक, गार्डनिंग आदि करिए। डॉक्टर से बात करने के बाद वॉटर एरोबिक्स करें।

डॉ. पीएनरंजन
सीनियर कंसल्टेंट, न्यूरोलॉजी,
अपोलो हॉस्पिटल, नई दिल्ली

How to reduce calories to lose weight - low calorie food

How to reduce calories to lose weight - low calorie food
एक दिन में 100 कैलोरी कम करने के लिए खाइए -

अकसर लोंगों के टेंशन रहती है कि क्या खाएं, जिससे वजन काबू में रहे। कम से कम कैलोरी के लिए, खाने में इन चीजों को शामिल करीए। 

खाने में छुपा हुआ शुगर कंटेंट कितना है उसे पहचानिए: एक चम्मच शुगर यानी 20 किलो कैलोरी। शोध के अनुसार एक सामान्य भारतीय रोज़ाना 70 ग्राम यानी 14 चम्मच शुगर खाता है। शुगर की जगह पर कॉफी में दालचीनी और शहद का प्रयोग बिल्कुल मत करिए। 

ब्रेकफस्ट में ओटमील का सेवन: रेडी-टू-ईट सीरियल्स जैसे शुगर कॉर्नफ्लेक्स की जगह पर ओटमील खाने से फूड कम होने लगती है और लंच में कैलोरी का सेवन 31 फीसदी तक कम करते हैं। उदाहरण के लिए अगर आप लंच में 450 किलो कैलोरी खाते हैं तो ओटमील ब्रेकफस्ट करने के बाद 139 किलो कैलोरी का सेवन कम करेंगे। 

छोटी प्लेट का इस्तेमाल: प्लेट का साइज 12 इंच से 10 इंच करिए। ऐसा करने से कैलोरीज़ का सेवन 22 फीसदी तक कम किया जा सकता है। यानी 100 कैलोरी तक सेव कर सकते हैं। एक समय पर सामान्य व्यक्ति 500 किलो कैलोरी खाता है। 

शाम के वक्त हेल्दी स्नैक: शाम को 4 से 5 बजे के बीच छोटा बाउल होलव्हीट फ्लेक्स में चाट मसाला डाल कर खाएं। इसमें सिर्फ 362 किलो कैलोरी होते हैं, जबकि एक समोसे में 462 कैलोरीज़ पाई जाती हैं। 

खाने की शुरुआत फलों या सब्जियों वाले सलाद से करिए: फल या हरी सब्जियों से बने सलाद के साथ खाना शुरू करने से 12 फीसदी तक कम कैलोरी का सेवन करते हैं। सलाद और फलों में मौजूद फाइबर कंटेंट और पानी से पेट भर जाता है। हाई-कैलोरी वाले खाने का सेवन भी कम से कम करेंगे।